बिहार वाले जानते हैं यह दंड, बाकी भी जान लें
दंड आज के हिसाब से तपस्या है। बिहार में दंड देने की प्रथा बहुत पुरानी है। देश में कहीं-कहीं ऐसा लोग करते हैं, लेकिन वहां इसे अजूबा की तरह देखा जाता है। बिहार में लोक आस्था के महापर्व छठ में सबसे ज्यादा दंड देने वाले दिखते हैं। दंड देना कहा जाता है, लेकिन यह वस्तुत: खुद के शरीर को दंड देना है। किसी मनौती के लिए या इसके पूरा होने पर आराध्य को समर्पित होता है दंड। जैसे, छठ में लोग अपने घर या देवालय से छठ घाट तक दंड देते हैं। इसमें आस्थावान पुरुष या स्त्री खाली पैर रहते हैं। खड़े होकर भगवान को प्रणाम करते हैं, फिर झुकते हुए जमीन पर सीने के बल लेटते हैं और एक हाथ से आगे चिह्न लगा देते हैं। फिर उठकर उस चिह्न तक कदम बढ़ाकर यही प्रक्रिया दुहराते हैं।
दंडयात्रा करने के दौरान कामेश्वर मिश्रा और उनकी पत्नी अवंतिका मिश्रा।
- फोटो : अमर उजाला
कौन हैं दंड यात्रा करने वाले कामेश्वर-अवंतिका
कामेश्वर कुमार मिश्रा (37) और उनकी पत्नी अवंतिका मिश्रा (25) पूजा पाठ करने वाले साधारण ब्राह्मण परिवार से हैं। इनकी दो साल का एक बच्ची भी है, जिसका नाम नंदिनी (सिया) है। अवंतिका मिश्रा दरभंगा जिला के कमतौल थाना क्षेत्र अंतर्गत अहियारी स्थित देवी अहिल्या स्थान मंदिर में मुख्य पुजारी हैं। पति कामेश्वर कुमार मिश्रा उसी मन्दिर में उनकी सहायता करते हैं। 25 अक्टूबर को दोनों ने पत्नी अहिल्यास्थान से पुनौराधाम होते हुए अयोध्या धाम के लिए दंड यात्रा शुरू की है। इनके साथ और भी कई लोग हैं, हालांकि दंड यात्रा यही दो कर रहे हैं।
दंड यात्रा के दौरान स्थानीय लोगों के साथ कामेश्वर मिश्रा और उनकी पत्नी अवंतिका मिश्रा।
- फोटो : अमर उजाला
कैसे मिली प्रेरणा, क्या उद्देश्य है इस यात्रा का
'अमर उजाला' से बातचीत में कामेश्वर कुमार मिश्रा ने कहा- "कुछ लोग रामायण पर टिप्पणी करते हैं। रामायण की पंक्तियों के साथ छेड़छाड़ करते हैं। उसका अपमान करते हैं। सनातन धर्म को बदनाम करने की कोशिश करते हैं। यह सब देखते हुए मैं सनातन हिन्दू को जागृत करने के लिए निकला हूं। भगवान श्रीराम से यह मांगने जा रहा हूँ कि सभी हिन्दू जागे। जब श्रीराम का प्रतिरूप बनाने के लिए देवशिला ले जाया जा रहा था, तभी मैंने संकल्प लिया था कि जब यह देवशिला हमारे आराध्य की शक्ल में आ जाएगा और जब मेरे प्रभु अपने घर में विराजमान होंगे तो वहां तपस्या करते हुए पहुंच जाऊं। अब तक की यात्रा में औसतन तीन किलोमीटर ही एक दिन में चल पा रहा हूं। उस हिसाब से 22 जनवरी को तो पहुंचना असंभव है। इसलिए उस दिन जहां ठहरूंगा, वहां कम-से-कम
108 दीये जलाकर श्रीराम की आराधना करूंगा।" पत्नी अवंतिका कहती हैं- "प्रण मेरे पति ने लिया था, लेकिन मुझे लगा कि जब प्रभु श्रीराम वन जाने लगे तो माता सीता भी उनके साथ चली गई थीं। इसलिए, मैं भी समान कष्ट लेकर भगवान श्रीराम के दर्शन के लिए निकली हूं। अपनी बेटी सिया को अपनी मां के पास छोड़ दिया है। अब तक अधिकतम पांच किलोमीटर एक दिन में चले हैं, लेकिन अमूमन तीन किलोमीटर चल पा रहे हैं। यह प्रण प्रभु श्रीराम के नाम का है, वही जानें कब पहुंचेंगे हम।"
कैसे सेवा कर रहे साथ में चल रहे लोग, यह जानें
कामेश्वर मिश्रा और अवंतिका मिश्रा की इस दंड यात्रा में सेवा के लिए आठ लोग साथ हैं। यह बारी-बारी से सेवा करते हैं और फिर साथ चल रही भजन-गाड़ी पर बैठकर सुस्ताते हैं। सेवादार विन्देश्वरी साह दंड के रास्ते पर मैट बिछाते चलते हैं। शुभम कुमार झा भजन वाली गाड़ी चलाते हैं। बबलू मिश्रा और बालदेव दास सेवादार के रूप में साथ चलते हैं। बाल भगवान बने 9 साल के करण कुमार और 11 वर्षीय आशीष कुमार दोनों को फलाहार करवाते हैं। अवंतिका मिश्रा के अंग वस्त्र साफ-सुथरा करने के लिए रिंकी कुमारी चलती है। बहन सुधा देवी बाकी सुविधा देखती हैं।