पूर्व में होने वाले चुनावों में किसी भी पोलिंग बूथ पर हर किसी की निगाहें बुरका पहने महिलाओं की लंबी लंबी लाइनों पर होती थी। पूर्व में बिहार में होने वाले चुनावों में भी इसकी झलक दिखती थी लेकिन मौजूदा विधानसभा चुनावों में यह नजारा नहीं दिखाई देता।
चुनावों के तीन चरण बीतने के बाद भी मतदान बूथों पर बुर्कानशीं उन महिलाओं की कतारें अब कम ही देखने को मिल रही हैं। तो क्या ऐसा है कि इस बार मुस्लिम महिलाएं वोट देने के लिए घरों से निकलने में परहेज कर रही हैं।
शायद ऐसा कहना ठीक नहीं होगा, माना जा रहा है कि मुस्लिम महिलाओं ने इस बार के चुनावों में वोट देने के लिए बुर्के को अलविदा कह दिया है। ये बिहार विधानसभा चुनावों में इस बार आया एक नया बदलाव है जिसके पीछे राजनीतिक दलों की भी सोची समझी रणनीति है।
वोटों के ध्रुवीकरण की आशंका ने बिगाड़ी चाल
एक वरिष्ठ जेडीयू नेता के अनुसार मुस्लिम महिलाओं ने चुनावों के दौरान विशेष पहचान बन चुके बुर्के का फिलहाल त्याग कर दिया है। असल में नीतीश कुमार की जनता दल यूनाइटेड के नेताओं को यह सबक मिला बीते लोकसभा चुनावों में।
जब मोदी लहर पर लड़े गए चुनावों में वोटों का जमकर ध्रुवीकरण हुआ। वो बताते हैं कि उस दौरान बुर्के में एक साथ निकली मुस्लिम महिलाएं वोट डालने जाती तो लगता जैसे थोक के भाव वोट भाजपा विरोधी दलों को पड़ रहे हैं।
अखबारों और टीवी चैनलों में बुर्के पहनकर कतारों में लगी महिलाओं की तस्वीरों ने ऐसा असर डाला कि जो वोट लालू और नीतीश की झोली में जा सकते थे वो भी भाजपा के पक्ष में गोलबंद हो गए। नतीजतन पूरा लोकसभा चुनाव हिंदू बनाम मुस्लिम बन गया।
लो प्रोफाइल बने हुए हैं मुस्लिम मतदाता
जिसका भाजपा ने भरपूर फायदा उठाया। इस तरह के छुटपुट वाक्यों से मुस्लिम नेताओं ने सीख ली और इसका असर इस बार के चुनावों में देखा जा रहा है। जहां मुस्लिम मतदाता पूरी तरह लो प्रोफाइल बना हुआ है।
वह अपनी उस पहचान को जाहिर नहीं करना चाहता जिससे आसानी से उसमें और अन्य वोटरों में अंतर किया जा सके। न तो मुस्लिम महिलाएं और पुरुष वोटर जत्थों के जत्थों में वोट देने जा रहे हैं न ही एक साथ लाइन लगाकर वोट दी जा रही है।
मुस्लिम मतदाताओं के रुख में आए इस बदलाव का असर निश्चित रूप से चुनावों पर भी देखने को मिलेगा। लेकिन यह क्या असर डालेगा इसका खुलासा 8 नवंबर को ही पता चल सकेगा।