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बिहार: 14 साल पहले छह हजार रुपये की घूस लेते पकड़ा था, अब पूर्व पेशकार को हुई तीन साल की जेल

Tue, 13 Oct 2026 08:48 PM IST
शबाहत हुसैन न्यूज डेस्क, अमर उजाला, भागलपुर

सार

भागलपुर की अदालत ने 2012 के रिश्वत मामले में कटिहार डीसीएलआर कार्यालय के तत्कालीन पेशकार वीरेंद्र कुमार सिन्हा को तीन साल के सश्रम कारावास की सजा सुनाई। दोषी पर 12,000 रुपये जुर्माना लगाया गया। मामले में 17 गवाहों ने गवाही दी।
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भागलपुर की अदालत - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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भागलपुर की अदालत ने कटिहार के उप समाहर्ता भूमि सुधार (डीसीएलआर) कार्यालय में पदस्थ रहे तत्कालीन पेशकार वीरेंद्र कुमार सिन्हा को रिश्वत लेने के मामले में दोषी ठहराते हुए तीन साल के सश्रम कारावास की सजा सुनाई है। अदालत ने दोषी पर भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की विभिन्न धाराओं के अंतर्गत कुल 12,000 रुपये का जुर्माना भी लगाया है। यह फैसला वर्ष 2012 के एक चर्चित घूसकांड में सामने आया है, जिसमें भूमि सुधार कार्यालय के कर्मचारी ने एक लंबित मामले में फैसला देने के नाम पर शिकायतकर्ता से मोटी रकम की मांग की थी। न्यायिक प्रक्रिया पूरी होने के बाद अदालत ने आरोपी कर्मचारी को सजा सुनाकर जेल भेजने का आदेश जारी कर दिया।

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धारावार सजा और 12,000 रुपये का जुर्माना
अदालत ने वीरेंद्र कुमार श्रीवास्तव उर्फ वीरेंद्र कुमार सिन्हा को भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के अलग-अलग प्रावधानों के तहत सजा सुनाई है। अदालत ने दोषी को कानून की धारा 7 के अंतर्गत तीन साल का सश्रम कारावास और 6,000 रुपये जुर्माने का आदेश दिया। इसके साथ ही, अदालत ने धारा 13(2) के तहत दोषी को दो साल के सश्रम कारावास तथा 6,000 रुपये अतिरिक्त जुर्माने की सजा सुनाई। इस तरह दोनों धाराओं को मिलाकर आरोपी पर कुल 12,000 रुपये का आर्थिक दंड तय किया गया है। यदि दोषी इस जुर्माना राशि का भुगतान नहीं करता है तो उसे दो महीने की अतिरिक्त साधारण कैद की सजा भुगतनी होगी। अदालत के अंतिम आदेश की प्रति से इस बात की पुष्टि होनी बाकी है कि दोनों धाराओं के तहत मिली सजाएं एक साथ चलेंगी या अलग-अलग अवधि में पूरी होंगी।

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60,000 रुपये की घूस और छापेमारी का घटनाक्रम
यह पूरा मामला वर्ष 2012 का है, जब कटिहार निवासी मनोज कुमार सिंह ने भ्रष्टाचार की शिकायत दर्ज कराई थी। पीड़ित मनोज कुमार सिंह का एक मामला कटिहार स्थित डीसीएलआर कार्यालय में लंबित चल रहा था। इस लंबित प्रकरण में अपने पक्ष में अंतिम आदेश जारी कराने के लिए उन्होंने कार्यालय के पेशकार से संपर्क किया था। शिकायतकर्ता के अनुसार, पेशकार वीरेंद्र कुमार सिन्हा ने काम के बदले कुल 60,000 रुपये की रिश्वत मांगी थी। इस रिश्वत राशि में से 50,000 रुपये तत्कालीन डीसीएलआर के लिए और 10,000 रुपये पेशकार के अपने लिए तय हुए थे। पीड़ित की इस शिकायत पर आर्थिक अपराध इकाई ने जांच शुरू की। आर्थिक अपराध इकाई की टीम ने 6 जुलाई 2012 को आरोपों का सत्यापन किया। जांच के दौरान पेशकार ने काम आगे बढ़ाने के लिए 6,000 रुपये अग्रिम राशि के रूप में मांगे थे। सत्यापन में आरोप सही पाए जाने के बाद आर्थिक अपराध इकाई ने आरोपी को रंगे हाथों पकड़ने के लिए जाल बिछाया।

17 गवाहों की हुई गवाही
आर्थिक अपराध इकाई की टीम नवगछिया से रवाना होकर कटिहार स्थित डीसीएलआर कार्यालय पहुंची और वहां योजनाबद्ध तरीके से छापेमारी की। इस कार्रवाई के दौरान टीम ने पेशकार वीरेंद्र कुमार सिन्हा को पीड़ित से 6,000 रुपये की रिश्वत लेते हुए मौके पर ही रंगे हाथों गिरफ्तार कर लिया। इस दौरान कार्यालय में मौजूद तत्कालीन डीसीएलआर डोमन राम पुलिस टीम को देखकर मौके से फरार हो गए थे। इसके बाद तत्कालीन डीसीएलआर डोमन राम के विरुद्ध भी नामजद प्राथमिकी दर्ज की गई थी।
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इस चर्चित मामले में अदालती सुनवाई के दौरान अभियोजन पक्ष ने अपने आरोपों को साबित करने के लिए अदालत के सामने कुल 17 गवाह पेश किए। अदालत ने अभियोजन पक्ष के गवाहों के बयान और पेश किए गए साक्ष्यों का गहराई से अध्ययन किया। न्यायालय में लगभग तीन साल तक चले गहन विचार-विमर्श और बहस की प्रक्रिया पूरी होने के बाद अदालत ने अपना निर्णय सुनाया।

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