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बिहार में कायम है मोदी का आकर्षण, लोगों की गरीबी के लिए क्या ये 'दोनों' जिम्मेदार हैं

Tue, 10 Nov 2020 08:47 PM IST
Harendra Chaudhary जितेंद्र भारद्वाज, अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

अगर तेजस्वी किसानों का मुद्दा अपने नारे में शामिल कर लेते, तो आज नतीजे कुछ और ही रहते। दूसरी तरफ नीतीश कुमार, जिन्होंने अपने पंद्रह साल के शासन में सरकार पर ही ज्यादा ध्यान दिया...
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पीएम नरेंद्र मोदी-तेजस्वी यादव-नीतीश कुमार (फाइल फोटो) - फोटो : PTI
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बिहार विधानसभा चुनाव के मतों की गिनती का काम चल रहा है। कभी एनडीए तो कभी महागठबंधन आगे हो जाता है। देर रात तक स्थिति स्पष्ट होने के आसार हैं। राजनीति के जानकार और जेएनयू के पूर्व प्रोफेसर डॉ. आनंद कुमार का कहना है, बिहार चुनाव के अभी तक मिल रहे रुझान बताते हैं कि वहां पीएम नरेंद्र मोदी का आकर्षण कायम है।

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लोगों ने अपने वोट के जरिए काफी हद तक इस सवाल का जवाब देने का प्रयास किया है कि बिहार की गरीबी के लिए भाजपा जिम्मेदार नहीं है। बहुत से लोग इसके लिए कांग्रेस या राष्ट्रवादी जनता दल को जिम्मेदार ठहराते हैं। आरजेडी का महागठबंधन भी सत्ता के करीब है। कमजोर संगठन होने के बावजूद लालू यादव के बेटे तेजस्वी आज टक्कर देने की स्थिति में हैं। चुनाव प्रचार के बीच जब तेजस्वी के हाथ 'कमाई' का नारा हाथ लगा तो उसी वक्त वे यदि किसानों के बारे में भी कुछ सोच लेते तो आज उनकी पार्टी अपने दम पर स्पष्ट बहुमत में आ सकती थी।

प्रो. आनंद कुमार के अनुसार, बिहार में महागठबंधन का संगठन कमजोर रहा है। जब किसी मोर्चे में कई दल शामिल होते हैं तो कार्यकर्ताओं में असमंजस की स्थिति बनी रहती है। आरजेडी का संगठन कमजोर होने के साथ साथ वह एक परिवार की परिधि से बाहर नहीं निकल पाया। इससे जनाधार कम होता चला गया। कांग्रेस और भाजपा की तरह आरजेडी की अपनी कोई विचारधारा नहीं है।
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वामपंथी दल, जो बिहार में एक सूखी हुई नदी की तरह रहे हैं, वे प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष तौर पर लालू यादव के साथ चलते रहे। आरजेडी ने लोकसभा चुनाव में हुई हार से कोई सबक नहीं लिया। संगठन एवं लोगों से दूरी बनी रही। विधानसभा चुनाव का प्रचार शुरू हो गया, लेकिन तेजस्वी के पास कोई गंभीर मुद्दा नहीं था। जाति को लेकर वे आगे बढ़ रहे थे। बीच में कहीं से कमाई वाला नारा उनके हाथ लगा, तब वे युवाओं को अपने साथ जोड़ सके।

लेकिन किसानों का मुद्दा अगर वे अपने नारे में शामिल कर लेते तो आज नतीजे कुछ और ही रहते। दूसरी तरफ नीतीश कुमार, जिन्होंने अपने पंद्रह साल के शासन में सरकार पर ही ज्यादा ध्यान दिया।महिलाओं के हितों के लिए फैसले ले लिए, लेकिन इन सबके बीच पार्टी संगठन का काम पीछे छूट गया।

नीतीश कुमार, बिहार तक ही सीमित होकर रह गए हैं। उन्हें राष्ट्रीय राजनीति में कदम रखना चाहिए था। प्रो. आनंद कुमार बताते हैं कि देखिये, इस पार्टी की विरासत तो है, लेकिन भविष्य को लेकर कुछ नहीं कहा जा सकता। जॉर्ज फर्नांडिस और शरद यादव, जैसे नेता इस पार्टी के अध्यक्ष रहे हैं। आज हालत ऐसी हो चली है कि उनके परिजन दूसरी पार्टियों से चुनाव लड़ रहे हैं। इससे संगठन कमजोर होता है।

ऐसी स्थिति में कार्यकर्ता को अपने कल का कुछ पता नहीं होता। अब कोई ये सवाल करे कि नीतीश के बाद पार्टी को कौन संभालेगा। इसका जवाब देने के लिए बहुत सोचना पड़ेगा। बेहतर होता कि नीतीश कुमार समय रहते बिहार में दूसरी पंक्ति के नेताओं को आगे आने का अवसर प्रदान करते और खुद, राष्ट्रीय राजनीति में भाग्य आजमाते।

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