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लालू नीतीश के दाव से ही उन्हें पटखनी दे रहे अमित शाह

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बिहार में आने वाले विधानसभा चुनावों की जंग काफी दिलचस्प होने वाली है। राजद प्रमुख लालू यादव के महागठबंधन के साथ चुनावी समर में उतरने की तैयारी कर रही जेडीयू को विधान परिषद चुनावों में मिली हार ने जबरदस्त झटका दे दिया है।
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विधानसभा चुनावों का सेमीफाइनल माने जा रहे इन चुनावों में सभी हथकंडे अपनाने के बावजूद भी जेडीयू भाजपा के मुकाबले काफी पिछड़ती नजर आई।

जेडीयू को जहां मात्र पांच सीटें मिलीं वहीं लालू यादव का राजद मात्र चार सीटों पर सिमट गया जबकि कांग्रेस के पल्ले एक सीट ही पड़ी जबकि विपक्षी भाजपा अकेले दम 12 सीटें पाने में सफल रही।

ऐसे में लालू-नीतीश के सामने आगामी चुनावों में कार्यकर्ताओं का मनोबाल बनाए रखना तो चुनौती होगा ही उन्हें यह हार पाटने के लिए भी खासी मशक्कत करनी पड़ेगी।
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जाति के वार से ही गठबंधन को मात दे रहे अमित शाह

इस जोड़ी की सबसे बड़ी दिक्‍कत ये है कि भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने उनके गढ़ में मात देने के लिए उनके ही जाति के दाव पर अमल करना शुरू कर दिया है।

अभी तक जातिगत मुद्दों को हवा देकर बिहार की राजनीति में अपनी पैठ बनाए रखने वाले लालू यादव के सामने अमित शाह ने ओबीसी कार्ड खेलकर उनका तरकश खाली कर दिया है।

जबकि दलित और महा दलित के भरोसे सत्ता में वापसी की उम्‍मीद लगाए बैठे नीतीश के सामने भाजपा के सिपसलार के रूप में खड़े मांझी और पासवान मुश्किलें खड़ी कर सकते हैं, दोनों नेताओं की दलितों में जबरदस्त पकड़ मानी जाती है। हालांकि ऐसा नहीं है कि इस खतरे से लालू और नीतीश वाकिफ नहीं हैं।
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खतरा भांपकर सड़क पर उतरे लालू यादव

जातिगत समीकरणों में बेशक नीतीश उतनी जुगलबंदी न कर पाएं लेकिन राजनीति के घाघ खिलाड़ी लालू यादव इसकी अहमियत बखूबी समझते हैं। यही कारण है कि आगामी खतरे को भांपते हुए लालू यादव जाति के कार्ड को मजबूत करने के लिए मैदान में उतर आए हैं।

सोमवार को पटना में केन्द्र सरकार के खिलाफ रैली निकालकर जनगणनना के जातिगत आंकडो को जारी करने की मांग को लेकर सड़क पर उतरे लालू यादव का असली निशाना बिहार की वे जातियां ही हैं जिनका वो अभी तक रहनुमा होने का दावा करते रहे हैं।

बिहार की राजनीति में जातिगत समीकरणों का अभी भी बहुत महत्व है। खासकर भूमिहार-पिछड़े और दलितों का यहां की राजनीति में जबरदस्त हस्तक्षेप है।
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