भारत के इतिहास में बिहार का योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण रहा है। यह प्रदेश न केवल बौद्ध और जैन धर्म का उद्गम स्थल रहा है, बल्कि मौर्य साम्राज्य जैसे विश्व के पहले संगठित साम्राज्य की जन्मभूमि भी है। चाणक्य, लोकतंत्र की अवधारणा और ज्ञान की परंपरा ने यहीं से जन्म लिया। नालंदा और विक्रमशिला जैसे विश्वविद्यालयों ने पूरे विश्व में ज्ञान का आलोक फैलाया।
हालांकि नालंदा में पुनः विश्वविद्यालय की स्थापना हो चुकी है, लेकिन विक्रमशिला को अभी भी उसके गौरवशाली अतीत के अनुरूप पुनर्जीवित करने की आवश्यकता है। यह बात नेशनल मेरिटाइम हेरिटेज कॉम्प्लेक्स, लोथल के संस्थापक, पूर्व महानिदेशक और डेक्कन कॉलेज डीम्ड यूनिवर्सिटी (पुणे) के पूर्व कुलपति प्रोफेसर वसंत शिंदे ने विक्रमशिला महाविहार (कहलगांव, भागलपुर) के भ्रमण के बाद अमर उजाला से खास बातचीत में कही।
प्राचीन ज्ञान को फिर से जीवंत करने का अवसर
प्रो. शिंदे ने कहा, "यदि विक्रमशिला में फिर से विश्वविद्यालय की स्थापना होती है, तो प्राचीन तंत्र शास्त्र की शिक्षा को वैज्ञानिक दृष्टिकोण से पुनः शुरू किया जा सकता है। ब्लैक मैजिक कहे जाने वाले कई तंत्रविद्या वास्तव में विशुद्ध विज्ञान हैं, जिन्हें एक बार फिर से विश्व के समक्ष प्रस्तुत करने की आवश्यकता है।"
विश्वविद्यालय से पर्यटन को मिलेगी नई दिशा
उन्होंने कहा कि यदि विक्रमशिला को केंद्रीय विश्वविद्यालय का दर्जा दिया जाता है, तो ऐतिहासिक धरोहर और आधुनिक शिक्षा का संगम पर्यटन को भी नई गति देगा। इससे स्थानीय अर्थव्यवस्था को बल मिलेगा और आधारभूत संरचनाओं का भी विकास होगा। उन्होंने यह भी कहा कि जब कोई विश्वविद्यालय स्थापित होता है, तो पुरातात्विक महत्व की उस जगह पर अनुसंधान और उत्खनन की संभावनाएं भी बढ़ जाती हैं। इससे भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) को और गहराई से रिसर्च करने का अवसर मिलेगा।
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नालंदा की तरह विक्रमशिला का भी व्यापक उत्खनन जरूरी
प्रो. शिंदे ने बताया कि ऐतिहासिक प्रमाणों से यह तो सिद्ध हो चुका है कि तिब्बत के विद्वान विक्रमशिला आया करते थे, लेकिन यह भी संभव है कि म्यांमार, इंडोनेशिया, थाईलैंड, कंबोडिया और वियतनाम जैसे बौद्ध देशों से भी लोग यहां आए हों। यदि यहां नालंदा की तरह समुचित उत्खनन किया जाए तो इन बातों के ठोस प्रमाण मिल सकते हैं।
उन्होंने बताया कि विक्रमशिला महाविहार का पुरातात्विक क्षेत्र लगभग सौ एकड़ में फैला हुआ है। समुचित उत्खनन से यह जानना संभव होगा कि इस विश्वविद्यालय की शुरुआत कैसे हुई, इसका विकास किस प्रकार हुआ और इसका अंत किन परिस्थितियों में हुआ। इसके अतिरिक्त, महाविहार के आसपास रहने वाले लोगों का विश्वविद्यालय के साथ कैसा संबंध था, इस दिशा में भी शोध की आवश्यकता है।
स्थानीय सहयोग आवश्यक
प्रो. शिंदे ने केंद्र और राज्य सरकार, दोनों से अपील की कि वे मिलकर इस ऐतिहासिक स्थल को फिर से जीवंत करें। इससे न केवल भारत की सांस्कृतिक विरासत को पुनर्जीवित किया जा सकेगा, बल्कि शिक्षा, पर्यटन और शोध के नए द्वार भी खुलेंगे। इस अवसर पर टीएमबीयू के प्राचीन इतिहास विभाग के पूर्व अध्यक्ष प्रो. बिहारी लाल चौधरी भी उपस्थित थे।