आज के समय में कारों में सनरूफ जैसे फीचर को काफी पसंद किया जाता है। अक्सर लोग चलती कार में सनरूफ से बाहर निकलकर मजा उठाते नजर आते हैं। लेकिन क्या आपको पता है कि सनरूफ का सही उपयोग क्या है और कारों में इसका चलन कैसे शुरू हुआ था। अगर नहीं, तो हम इस खबर में इसकी जानकारी दे रहे हैं।
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कैसे शुरू हुआ चलन
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- फोटो : सोशल मीडिया
भारत जैसे देश में जहां पर कई महीनों तक धूप प्रचुर मात्रा में होती है। वहां इस फीचर को कार में आने में काफी समय लगा। लेकिन इसका चलन मुख्य रूप से उन देशों में पहले शुरू हुआ जहां पर धूप की कमी थी। सूरज की रोशन कम होने के कारण कारों में अंधेरा रहता था। ऐसे में कारों की छत पर शीशा लगाकर सनरूफ का चलन शुरू हुआ। इससे ठंडे देशों में मिलने वाली कारों में सफर के दौरान ज्यादा रोशनी और धूप मिलती थी। जिससे कार में सफर करने वालों को विटामिन डी भी मिलता था और ज्यादा रोशनी के कारण कार में अंधेरा कम होता था।
रिपोर्ट्स के मुताबिक यूरोप, अमेरिका सहित ऐसे देश जहां पर काफी कम मात्रा में सूरज की रोशनी आती थी। उन देशों में इस फीचर को सबसे पहले कारों में शुरू किया गया। भारत में 90 के दशक के आस-पास कुछ लग्जरी कारों में इस फीचर को दिया जाने लगा। तब से ही भारत के लोगों के बीच इस फीचर को लेकर उत्सुकता बनी हुई है। पहले सिर्फ महंगी कारों में ही इस फीचर को दिया जाता था लेकिन आज के समय में दस लाख से कम की कीमत वाली कारों में भी इस फीचर को ऑफर किया जाता है।
रिपोर्ट्स के मुताबिक अमेरिका में हेंज सी प्रीचर को सनरूफ का जनक माना जाता है। जर्मनी में पैदा हुए प्रीचर काफी कम उम्र में ही ऑटो जगत से जुड़ गए थे। साल 1963 में उन्हें अमेरिका आने का मौका मिला और दो साल बाद उन्होंने लॉस एंजेलिस के एक गैराज में अमेरिकन सनरूफ कॉर्पोरेशन की स्थापना कर ली थी। समय के साथ कई देशों में इसका विस्तार हुआ।
आज के समय में भारत में कई कारों में सनरूफ को ऑफर किया जाता है। इनमें कुछ कारें दस लाख रुपये से कम कीमत में भी मिलती हैं। इन कारों में टाटा नेक्सन, मारुति ब्रेजा, महिंद्रा एक्सयूवी 300, टोयोटा अर्बन क्रूजर हाईराइडर, ह्यूंदै वेन्यू, किआ सेल्टॉस जैसी कारें हैं जिनकी कीमत दस लाख रुपये से कम में शुरू हो जाती है।