कई लोग सार्वजनिक परिवहन की खूबियों को नजरअंदाज कर देते हैं। और अपने रोजमर्रा की आवाजाही के लिए कार जैसे निजी परिवहन को तवज्जो देते हैं। हालांकि, हमारे शहरों में रोजाना यात्रा करने वाली कारों की बड़ी संख्या के कई प्रभाव होते हैं, जैसे अतिरिक्त प्रदूषण, भीड़भाड़ वाला वातावरण और भी बहुत कुछ। इन सबके अलावा कुछ ऐसा भी होता है जो हमारी सोच से भी परे है। एक क्रिएटिव विजुअलाइजेशन (रचनात्मक दृश्य) में अमेरिकी वाहन निर्माता सैटर्न ने 2003 में एक आंखें खोलने वाला विज्ञापन तैयार किया, जिसमें उसने दिखाया कि सड़कों पर चलने वाले वाहन जगह (स्पेस) को लेकर कितने अक्षम हैं।
हमारे गैराज में जगह घेरने से लेकर व्यस्त सड़क पर कीमती वर्ग मीटर जगह भरने तक, हमारी कारें एक ऐसी मशीन हैं जो बहुत ज्यादा जगह घेर लेती हैं। और नियमित आधार पर सिर्फ एक या दो यात्रियों को ले जाते हुए ऐसा करती हैं।
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जैसा कि हम इस विज्ञापन में देखते हैं, हमारी कारें हमारे घरों, व्यस्त सड़कों और यहां तक कि हाईवे पर जितनी जगह घेरती हैं वह वास्तव में जरूरत से कहीं ज्यादा है। यदि कारें छोटी होतीं, तो हमें बड़े गैरेज या ड्राइव-वे की जरूरत नहीं होती। सड़कें इतनी चौड़ी नहीं होतीं और सड़कों पर भीड़भाड़ उस स्थिति से बहुत कम होती जिसका हम दैनिक आधार पर सामना करते हैं। पार्किंग स्थल बहुत छोटे होंगे और बर्बाद होने के लिए इतनी उपयोगी जगह की जरूरत नहीं होगी।
सैटर्न ने यह विज्ञापन तब जारी किया था जब उसने अपने तीन मॉडलों को मॉडर्न और स्पेस एफिशिएंट डिजाइन के लिए नया रूप दिया था। स्मार्ट ऑटोमोबाइल जैसे अन्य ब्रांड स्पेस एफिशिएंट पर्सनल मोबिलिटी सॉल्यूशन पेश कर रहे हैं जिन्हें माइक्रो-कार भी कहा जाता है। भीड़भाड़ वाले शहरी इलाकों की इस समस्याओं के साथ, ऐसे कार के कॉन्सेपट भारत के लिए नए नहीं हैं। टाटा मोटर्स ने नैनो पेश की थी, रेवा ऑल-इलेक्ट्रिक माइक्रो कार एक और उत्पाद था जो शायद अपने समय से आगे था।
हालांकि, लोगों की धारणा और हाईवे के सफर में इनकी उपयोगिता सहित कई मुद्दों की वजह से स्पेस एफिशिएंट कारें कहीं भी बड़े पैमाने पर बाजार पर कब्जा करने में सफल नहीं रही हैं। इस समय भारतीय बाजार में कुछ ऐसी छोटी इलेक्ट्रिक कारों का ऑप्शन उपलब्ध है जो अपने रोजमर्रा के शहरी आवाजाही के लिए एक स्पेस एफिशिएंट वाहन चाहते हैं।