कोर्ट ने सरकार से पूछा सवाल
बुधवार को हाई कोर्ट ने सरकार से पूछा कि आखिर व्यापार पर पाबंदी क्यों लगाई जा रही है, जबकि इसे नियंत्रित करना भी संभव है। चीफ जस्टिस विभु बखरू और जस्टिस सीएम जोशी की बेंच ने सरकार से कहा कि इस मुद्दे पर गंभीरता से सोचा जाए, क्योंकि यह लोगों की आजीविका से जुड़ा मामला है। इस मामले की अगली सुनवाई 22 सितंबर को होगी।
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सरकार को नीति बनाने का सुझाव
कर्नाटक के परिवहन मंत्री रामलिंगा रेड्डी ने कहा कि हाई कोर्ट ने सरकार को एक महीने का समय दिया है, ताकि यह तय किया जा सके कि बाइक टैक्सी के लिए कोई नीति बनाई जाए या नहीं। हालांकि उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि कोर्ट ने कंपनियों को औपचारिक रूप से संचालन की अनुमति नहीं दी है। फैसला प्रवर्तन एजेंसियों से चर्चा के बाद लिया जाएगा।
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13 राज्यों में मान्यता प्राप्त है बाइक टैक्सी
कोर्ट ने यह भी कहा कि देश के 13 राज्यों में बाइक टैक्सी को कानूनी रूप से मान्यता मिली हुई है। यह संविधान के अनुच्छेद 19(1)(g) के तहत संरक्षित एक वैध व्यापार है। कोर्ट ने यह भी कहा कि सीधे तौर पर रोक लगाना "प्रत्यक्ष प्रतिबंध" जैसा है, जबकि राज्य चाहे तो नियम बनाकर इसे नियंत्रित कर सकता है। केंद्रीय मोटर वाहन एग्रीगेटर गाइडलाइंस 2025 में भी राज्यों की मंजूरी के अधीन बाइक टैक्सी की अनुमति दी गई है।
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आजीविका और जरूरत दोनों है बाइक टैक्सी
बाइक टैक्सी वेलफेयर एसोसिएशन के अध्यक्ष अदी नारायण ने कहा कि हाई कोर्ट की टिप्पणी ने यह साफ कर दिया है कि बाइक टैक्सी न सिर्फ कानूनी रूप से वैध हैं बल्कि शहरी परिवहन के लिए बेहद जरूरी भी हैं। उन्होंने कहा कि बाइक टैक्सी लोगों को सस्ती, सुरक्षित और तेज लास्ट-माइल कनेक्टिविटी देती हैं। यह किसी विलासिता की चीज नहीं बल्कि एक जरूरत है। कोर्ट ने यह भी माना कि यह ड्राइवरों की आजीविका की सुरक्षा से जुड़ा मुद्दा है।
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जून में लगा था बैन
गौरतलब है कि कर्नाटक में 16 जून को बाइक टैक्सी पर रोक लगा दी गई थी। इसके चलते ऑफिस जाने वाले कई लोग मजबूरी में महंगे ऑटो और कैब लेने लगे थे या फिर पब्लिक ट्रांसपोर्ट पर निर्भर रह गए थे। यह प्रतिबंध 2 अप्रैल को जस्टिस बी श्याम प्रसाद के आदेश के बाद लगाया गया था। जिसमें कहा गया था कि जब तक सरकार मोटर व्हीकल एक्ट के तहत नियम और गाइडलाइन नहीं बनाती, तब तक सेवाओं को बंद रखा जाए।
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