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ब्रह्मांड का अभी भी विकास हो रहा है

Fri, 13 Jul 2018 04:09 PM IST
प्रभु नीराजन
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भूतकालीन स्थिति की अपेक्षा वर्तमान काल में ग्रहों-तारों की मध्यवर्ती दूरी बढ़ी है। भविष्य में उसके और भी बढ़ते जाने की प्रक्रिया को देखते हुए शोधकर्ता इस निष्कर्ष पर पहुंचे हैं कि ब्रह्मांड का अभी भी विकास हो रहा है। माना पदार्थ चल रहा है, लेकिन क्यों चल रहा है? किधर और कैसे चल रहा है? फिलहाल ये अनसुलझे सवाल हैं। पदार्थ और उसमें गति शुरू होने को लेकर कई मत हैं। जिस मुद्दे पर अब सहमति सी हो चली है, वह यह कि शुरू में थोड़ा-सा सघन द्रव्य (मास) था। उसमें अचानक किसी अज्ञात कारण से विस्फोट हुआ और उसकी धज्जियां उड़ गईं। असंख्य टुकड़े होकर  बिखर गए। इस बिखराव ने कोई दिशा पकड़ी। ज्यादातर तो लट्टू की तरह अपनी धुरी पर घूमने और भागने भी लगे। चूंकि यह सृष्टि गोल है, इसलिए गति भी गोल हुई और बढ़ती रही। दौड़ निरंतर रही और आखिर उसे गोल घेरा ही बनना पड़ा।
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सृष्टि द्रव्य के बिखरे टुकड़ों ने तो ब्रह्मांड के आंगन में भी घुड़दौड़ जारी रखी, उन्होंने चेतना की परिधि में भी यही तौर-तरीका अपनाया। वे भी अपनी-अपनी धुरियों पर घूमने लगे। विज्ञान वेत्ताओं के अनुसार, सृष्टि का द्रव्यमान शुरू में एक सघन बादल के रूप में था। उस स्थिति में उसका घनत्व 10-12 किलोग्राम प्रति क्यूविक मीटर आंका गया है। इस बादल को ‘प्रोटो गैलेक्सी’ के नाम से जाना जाता है। शुरू में बादल ऐसे ही अनगढ़ था। विस्फोट के बाद उस केंद्र और टुकड़ों में एक नई क्षमता जागी, जिसे अब गुरुत्वाकर्षण के नाम से जानते हैं। विस्फोट के बाद टुकड़े निहारिका बन गए और छोटे ग्रहों-तारों के रूप में बदल गए। निहारिकाएं अभी उतनी सुव्यवस्थित नहीं हो सकी हैं। 

जानकारों के अनुसार, ब्रह्मांड अभी फैल रहा है। उसके अंतराल में बसी निहारिकाएं और तारामंडल एक-दूसरे से दूर हट रहे हैं। हटने का मतलब पीछे लौटना ही नहीं, आगे की ओर बढ़ना भी है। तारों की दूरी का अनुमान इस आधार पर लगाया जाता है कि उनका प्रकाश धरती तक पहुंचने में कितना समय लगता है। प्रकाश की गति एक सेकंड में 1 लाख 86 हजार मील है। इस गति से वे सालभर में जितनी दूरी पार करते हैं, उसे एक प्रकाश वर्ष कहते हैं। पृथ्वी से कौन-सा तारा कितनी दूर पर है, इसकी गणना इसी आधार पर की जाती है कि उसका प्रकाश धरती तक आने में कितना समय लगता है? समय और दूरी का सिद्धांत इसी आधार पर बना है। 
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नई जानकारी यह है कि दूरियां हर क्षण या क्षण से भी छोटे समय में हजारों मील प्रति सेकंड के हिसाब से बढ़ रही हैं। एक और विचित्र बात है कि यह दूरी न केवल बदलती है, बल्कि उसकी गति भी बढ़ती है। मजे की बात यह है कि उसकी गति निरंतर बढ़ती ही जाती है। सिलसिला इसी तरह चलता रहा, तो फासला निरंतर बढ़ता-फैलता ही चला जाएगा। यह बात किसी एक-दो पिंड के बारे में नहीं, बल्कि सभी ग्रह-नक्षत्रों पर लागू होती है। वे एक-दूसरे के पास नहीं आ रहे, बल्कि धीर-धीरे अधिक दूर हटने की नीति अपनाए हुए हैं।

ब्रह्मांड प्रति सेकंड पांच सौ पचास किलोमीटर की गति से फूल-फैल रहा है। भूतकालीन स्थिति की अपेक्षा वर्तमान काल में ग्रहों-तारों की मध्यवर्ती दूरी बढ़ी है और भविष्य में उसके और भी बढ़ते जाने की प्रक्रिया को देखते हुए शोधकर्ता इस निष्कर्ष पर पहुंचे हैं कि ब्रह्मांड का अभी भी विकास हो रहा है। उसे परिवर्तन के लिए अनुभव करने, वृद्ध होने तथा पुनर्जन्म का चोला बदलने में अभी अकल्पनीय देरी है। यह समूचा प्रतिपादन इन दिनों ‘हथल सिद्धांत’ के नाम से मशहूर है।

अपना सूर्य जिस निहारिका का परिभ्रमण कर रहा है, उसका नाम ‘मंदाकिनी’ है। सूर्य इन दिनों दो लाख किलोमीटर प्रति घंटे की चाल से चल रहा है। अपनी निहारिका का एक पूरा चक्कर लगाने में उसे 24 करोड़ प्रकाश वर्ष लगते हैं। अनुमान है कि अपने सूर्य को अपनी निहारिका की दस परिक्रमा लगाते-लगाते बुढ़ापा आ जाएगा और एक-दो परिक्रमा और कर लेने के उपरांत उसका मरण हो जाएगा। अपनी निहारिका अब तक दस हजार तारा गुच्छकों को जन्म दे चुकी है। प्रत्येक तारा गुच्छक में कम से-कम एक सौ सूर्य हैं। इस प्रकार सूर्यों की संख्या दस लाख को पार कर गई। जिस प्रकार अपने सूर्य के दो ग्रह और 32 उपग्रह हैं। उसी प्रकार इन दस लाख सूर्यों के भी बाल-बच्चे होंगे।
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