प्रथम भाव-प्रथम भाव में शनि स्थित हो तो ऐसा जातक पूर्व जन्म में वैद्य अथवा जड़ी बूटियों का संग्रह करने वाला होता है,वह गूढ़ विद्या के रहस्य को भी जानने वाला होता है।
द्वितीय भाव- द्वितीय भाव में शनि हो तो ऐसा जातक पूर्व में अकारण किसी को सताता तथा परेशान करता था, उसके शाप के कारण जातक को शारीरिक,मानसिक,आर्थिक परेशानियों का सामना करना पड़ता है।
तृतीय भाव- तृतीय भाव में शनि-राहु की उपस्थिति तथा (षष्ठ भाव) में शनि-राहु की स्थिति ऐसे जातक को अदृश्य आत्माओं द्वारा भविष्य का ज्ञान होता है। इन्हें जमीनी धन का भी ज्ञान होता है।
चतुर्थ भाव-चतुर्थ भाव में शनि-राहु हो तो ऐसा जातक पूर्व जन्म में (सर्प) योनी का था, इन्हें सर्प की आकृति अथवा सर्प से भय पैदा होता है। इन्हें पशु एवं सर्प सेवा से विशेष लाभ मिलता हैं। पेट संबंधी विशेष बीमारियां लगी रहती हैं। किन्तु सेवा द्वारा स्वास्थ्य लाभ मिलता है।
पंचम भाव- पंचम भाव में शनि या राहु हो तो ऐसा जातक पूर्व जन्म में किसी घातक हथियार से प्राण लेने वाला होता है। जिसके कारण इन्हें पेट संबंधी कष्ट शारीरिक कष्ट बना रह सकता है, तथा देरी से सन्तान की प्राप्ति होती हैं अथवा सन्तान ही नहीं होती, होती है तो सन्तान से कष्ट प्राप्त होता है।
सप्तम भाव- सप्तम भाव में शनि या राहु हो तो ऐसा जातक पूर्व जन्म में ग़लत कार्यो के दोष भाषित करता है, इन्हें आंखो के रोग तथा अन्य शारीरिक कष्ट होता है। जीवन दुखमय व्यतीत होता है, ये सदा डरा हुआ जीवन व्यतीत करते है।
अष्टम भाव-अष्टम भाव में शनि या राहु हो तो ऐसा जातक पूर्व जन्म में किसी पर ग़लत ढंग से तंत्र-मंत्र का प्रयोग करनें वाला होता है। इस पाप के कारण इन्हें चोर-मुर्दा-सर्प का भय लगा रहता है तथा भयभीत जीवन व्यतीत करतें है।
नवम भाव- नवम भाव में शनि हो तो वह अकारण दूसरे जातक को परेशान करता है एवं उसकी उन्नति में बाधा पहुंचाने का कार्य करता था। यह प्रमाणित होता है। इस पाप के कारण ऐसा जातक व्यापार- नौकरी एवं किसी भी कार्य में बराबर बाधा का शिकार होता है। तथा इस जन्म में उन्नति करने में कठिनाईयों का सामना करना पड़ता है।
द्वादश भाव- द्वादश भाव मे शनि होने से ऐसा जातक का जन्म सर्प के आशीर्वाद से होता है,पूर्व जन्म में यह सर्प होता है। ऐसा जातक का जन्म आशीर्वाद से होता है तों उन्नति करता है। और शाप द्वारा अगर जन्म होता है तों विशेष परेशानियों को भोगता है।