कुंडली में महाधनी योग कब और कैसे बनता है
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आज के दौर में हर कोई धनवान जरूर बनने की कोशिश करता है। क्योंकि वर्तमान समय भौतिक भोग-विलास, सुख-सुविधाओं, आर्थिक उन्नति और लग्जरी चीजों का भरपूर आनंद लेने का है। बिना धन के सभी तरह की इच्छाओं की पूर्ति करना असंभव है, इसलिए हर कोई धन पाने की इच्छा में कड़ी मेहनत करता है, जिसमें कुछ लोग बहुत कामयाब होते हैं तो कुछ जीवन भर संघर्ष ही करते रह जाते हैं। वैदिक ज्योतिष शास्त्र के अनुसार व्यक्ति के जीवन में वह कितना धनवान होगा, किस-किस तरह का भौतिक सुख मिलेगा और समाज में कितना मान-सम्मान होगा यह सब जातक की कुंडली में मौजूद ग्रहों और नक्षत्रों के द्वारा बनने वाला शुभ योग से मालूम होता है।
जिन जातकों की कुंडली में महाधनी जैसे शुभ योग का निर्माण होता है, वह जातक अपने जीवन में थोड़े से ही प्रयास में काफी धन-दौलत, सुख-सुविधा और ऐशो-आराम का सुख प्राप्त करता है। वहीं अगर किसी जातक की कुंडली में अशुभ योग है, वह कई तरह की परेशानियों से घिरा हुआ होता है। जीवन में धन और सुख दोनों की कमी रहती है। इस कारण से हर कोई यह जरूर चाहता है कि उसकी कुंडली में महाधनी योग बने। आइए जानते हैं कि कुंडली में कब-कब और कैसे महाधनी योग बनता है, इसका ज्योतिषीय विश्लेषण करते हैं।
महाधनी योग क्या होता है ?
ज्योतिष शास्त्र के अनुसार कुंडली में ऐसे कई योग बनते हैं जिससे यह जान सकते हैं कि व्यक्ति अपने जीवन में कब और कितना धन अर्जित करेगा। धन प्राप्ति के लिए कुंडली में धन योग का बनना जरूरी होता है। जीवन में धन और वैभव की प्राप्ति के लिए धन योग के साथ-साथ लक्ष्मी योग का विशेष महत्व होता है। कुंडली का दूसरा भाव धन का भाव माना गया है, यानी इस भाव में शुभ ग्रहों की स्थिति से ही व्यक्ति धनवान बनता है। जन्मकुंडली के दूसरे भाव के अलावा चौथा, पांचवां, नवम, दशम और एकादश भावों का संबंध भी धन की प्राप्ति से जुड़ा हुआ होता है। वैदिक ज्योतिष शास्त्र के अनुसार इन भावों का संबंध लग्नेश, धनेशष पंचमेश, नवमेश और दशमेश से बनने पर जातक की कुंडली में महाधनी योग का निर्माण होता है।
- अगर किसी जातक की कुंडली में धनेश लाभ भाव में हो और लाभेश धन भाव में हो तो कुंडली में महाधनी योग बनता है।
- जब कुंडली में धनेश और लाभेश केंद्र या त्रिकोण में हों, मित्र ग्रहों से संबंध हो, इन पर शुभ ग्रहों की द्दष्टि हो तो जातक की कुंडली में महाधनी योग बनता है।
- जब धनेश और लाभेश दोनों ही केंद्र और त्रिकोण स्थान में युति करे तो महाधनी योग बनता है।
- अगर लग्नेश धन भाव में और धनेश लग्न भाव में स्थित हो तो विपुल नाम का धन योग का निर्माण होता है।
- जब कुंडली के दूसरे भाव यानी धन भाव में कोई शुभ ग्रह विराजमान हो तो जातक अपने जीवन में अथाह धन अर्जित करता है।
- जब धन भाव के स्वामी के साथ यानी द्वितीयेश के साथ कोई शुभ ग्रह की युति हो तो महाधनी योग बनता है।
- जब नवमेश धन भाव में या धनेश नवम भाव में हो या फिर नवमेश और धनेश दोनों ही द्वितीय, लाभ, चतुर्थ और फिर नवम भाव में हो तो जातक महाधनी बनता है।
- धनेश और दशमेश की युति होने पर भी जातक के जीवन में धन की कोई कमी नहीं होती है।
- लाभेश का द्वितीय, पंचम और नवम स्थान पर होने पर या फिर इन भावों के स्वामी का केंद्र या त्रिकोण स्थानों में युति होने पर जातक पर लक्ष्मी जी विशेष कृपा होती है।
- जब देवगुरु बृहस्पति कुंडली के केंद्र भावों यानी 1, 4,7 और 10 में विराजमान हो तो जातक महाधनी होता है।
- देवगुरु कुंडली के ग्यारहवें भाव में होने पर महाधनी योग का निर्माण होता है।
- धन भाव का स्वामी जब उच्च राशि का होकर केंद्र स्थान में बैठे तब महाधनी योग बनता है।
- लग्नेश यानी लग्न स्थान का स्वामी जिस भाव में बैठा हो इसे दूसरे भाव का स्वामी अगर उच्च राशि में होकर केंद्र में विराजमान है तो महाधनी योग बनता है।
- जब किसी जन्मपत्री में धनेश और लाभेश उच्च राशि में हो तो धन योग का निर्माण होता है।
- चंद्र और गुरु की युति शुभ भाव में होने पर महाधनी योग बनता है।
- चंद्रमा और मंगल दोनों एक साथ केंद्र, त्रिकोण और लाभ भाव में बैठे तो धन योग बनता है।
- लग्न से तीसरे, छठे, दसवें व ग्यारहवें भाव में शुभ ग्रह बैठे होने पर धन लाभ होता है।
- बुध अगर कर्क या मेष राशि में तो जातक के जीवन में धन, दौलत और संपदा की कोई कमी नहीं होती है।