वैदिक ज्योतिष में ऐसे कई सूत्र है जिनके माध्यम से यह ज्ञात किया जा सकता है कि अमुक व्यक्ति आध्यात्म की कितनी ऊंचाई तक जाएगा। कुछ लोग सिर्फ मंदिर जाकर रह जाते हैं, कुछ पुराण वेद पढ़ लेते हैं लेकिन मनन नहीं करते। कुछ विरले ऐसे होते हैं जिनके हाथों में मंत्र खेलते हैं। जिनकी लेखनी, विचार और आवाज में कुछ जादू सा होता है। ऐसे व्यक्ति संसार का सब सुख छोड़कर संन्यासी जीवन जीते हैं। आइये इस लेख में समझने की कोशिश करते हैं कि आखिर ऐसे कौन से योग हैं जो जातक को उच्च कोटि का साधक बना देते हैं।
1 - दूसरा भाव परिवार है, चौथा मां है और सप्तम पत्नी है। मनुष्य जीवन में इन्ही से बंधकर रहता है। अगर इन भावों के स्वामी या इन भावों पर बलवान शनि या केतु का प्रभाव हो तो जातक घर छोड़ता है।
2 - किसी भी कुंडली में लग्न जातक का शरीर है और चंद्र उसका मन है। अक्सर देखा गया है कि लग्न और चंद्र पर शनि केतु का प्रभाव जातक को कुछ हटकर सोचने की बुद्धि देता है। उसका सोचने का तरीका आम आदमी से अलग होता है।
3 - अगर लग्न का स्वामी मंगल, गुरु या शुक्र हो और उसी कुंडली में लग्न पर शनि की दृष्टि हो वहीं नवम भाव में गुरु विराजमान हों तो जातक तीर्थ धाम की यात्रा करेगा और अचानक से संन्यास लेगा।
4 - अगर दशम भाव का स्वामी 4 बलवान ग्रह के साथ (जिसमें शनि केतु भी होने चाहिए) अष्टम भाव में विराजमान हो तो राजा भी फ़क़ीर बनकर सब कुछ छोड़ देता है।
5 - अगर नवम भाव का स्वामी बलवान है, वो नवम या पंचम में विराजमान है। अगर उस पर गुरु शुक्र की दृष्टि हो अथवा तो साथ हो बैठे हो तो जातक उच्च कोटि का मन्त्र ज्ञाता होगा। उसके हाथ में मन्त्र खेलते हैं।
6 - अगर संन्यास योग में दशम का स्वामी बलवान नहीं है,अस्त है या निर्बल है या सप्तम भाव में बैठा है तो निश्चित ही ऐसा जातक लंपट होगा। सिर्फ दिखावा करता है और मन से कामुक होता है।
7 -अगर शुक्र का बेहद बलवान योग अष्टम और दशम से बने तो ऐसा जातक आधुनिक होते हुए भी मन्त्र को समझने वाला होगा। ऐसा व्यक्ति भौतिक संसार में रहकर ही विद्या से धन कमाता है।
8 - सूर्य शनि और गुरु का बलवान योग अष्टम भाव में होना चाहिए। इसमें कोई ग्रह अस्त नहीं हो और 1 ग्रह उच्च का हो तो जातक मंदिरों का निर्माण करवाने वाला होगा। राजाओं से धन लेकर धर्म के काम करवाने वाला संन्यासी होगा।
9 - शील प्रभुपाद, गौतम बुद्ध, रजनीश ओशो, श्री अरविंदो, मोरारी बापू । इन सबकी कुंडली में दशम भाव का स्वामी 3 से अधिक ग्रहों के साथ विराजमान होकर कार्य सिद्धि दे रहा है। ओशो की कुंडली में 5 ग्रह अष्टम भाव में थे।
10 - केतु और गुरु मोक्ष कारक होते हैं। द्वादश भाव जेल यात्रा, कष्ट, हानि के साथ ही मोक्ष भी है। शनि केतु गुरु इस भाव में जातक से तपस्या करवाते है और जातक मुसीबतों के बाद निखर जाता है। फिर धन आने के बाद भी मोह नहीं रहता और संसार छोड़ देता है।
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