सभी ग्रहों में शुभ माने जाने वाले बृहस्पति ग्रह अपनी स्वराशि धनु को छोड़कर मकर राशि में प्रवेश किया है। जहां पहले से ही शनि ग्रह मौजूद हैं। वैदिक ज्योतिषशास्त्र के अनुसार जन्मकुंडली में गुरु दूसरे, पांचवें, नवें और ग्यारहवें भाव का कारक होते हैं। जातकों की जन्मकुंडली में बृहस्पति का अलग-अलग भाव में रहना किस प्रकार का फल देता है, इसका ज्योतिषीय विश्लेषण करते हैं।
प्रथम भाव
- किसी भी जातक की जन्मकुंडली में प्रथम भाव में बृहस्पति का रहना कई तरह के अप्रत्याशित परिणाम दिलाता है। कई बार देखा गया है कि ऐसे लोगों में अहंकार की प्रवृत्ति जागृत होती है, जिसके दुष्परिणामस्वरूप वे अपना ही नुकसान कर बैठते हैं। ऐसे जातक प्रखर मस्तिष्क, कुशल प्रबंधन और तर्कशास्त्र में निपुण होते हैं। ये किसी भी तरह के माहौल को अपने अनुरूप ढाल सकते हैं।
द्वितीय भाव
- जिनकी जन्मकुंडली में बृहस्पति दूसरे भाव में बैठे हो ऐसे लोग कुशल वक्ता, मधुर भाषा बोलने वाले, धन-संपत्ति से युक्त परिवार का अच्छी तरह से भरण पोषण करने वाले होते हैं। यदि इनके साथ कोई पाप ग्रह हो तो उन्हें शिक्षा के क्षेत्र में कुछ परेशानियां झेलनी पड़ती है। ऐसे लोग झूठ बोलने से भी परहेज नहीं करते।
तृतीय भाव
- जिनकी जन्मकुंडली में बृहस्पति तीसरे भाव में होते हैं ऐसे लोग भ्रमणशील, पराक्रमी और अपने साहस के बल पर समाज में मान-प्रतिष्ठा पाते हैं। नौकरी में उच्च पद प्राप्त करने वाले ऐसे जातक पढ़ने-लिखने के मामलों में हमेशा तत्पर तो रहते ही हैं साथ में धर्म एवं आध्यात्म के मामलों में भी गहरी रुचि रखते हैं। पारिवारिक सदस्यों तथा भाई बहनों के प्रति अपनी जिम्मेदारियों का भी बखूबी निर्वहन करते हैं।