12 महीने नहीं आता पानी
किसान के लिए नदी व नहर खुशहाली का जरिया बनी है, लेकिन किसान नहरों में 12 महीने पानी नहीं आने से नाखुश हैं। किसान नेता रामौतार सिंह, हुक्म सिंह आदि का कहना है कि जिले में खरीफ की नहर है। जिनमें जुलाई से लेकर अक्तूबर तक ही पानी आता है। पानी नदी से नहरों व नहरों से रजवाहे में जाता है। आरोप है कि चंदक क्षेत्र में ऐसे रजवाहे हैं जिनमें नहरों से इतना कम पानी छोड़ा जाता है कि वह टेल तक भी नहीं पहुंचता है।
बान नदी का स्वरूप बदला
सीडीओ केपी सिंह ने बताया कि बान नदी बिजनौर व अमरोहा जिलों के बीच सेतु है। 103 किलोमीटर लंबी बान नदी को गंगा की तरह निर्मल बनाने के लिए अभियान चला। आसपास की सैकड़ों बीघा जमीन को ग्रीन बेल्ट में बदला। बान नदी, नूरपुर ब्लॉक की 22 ग्राम पंचायत के 42.50 किमी लंबाई में, नहटौर ब्लॉक की 18 पंचायत के 28 किमी लंबाई में, किरतपुर ब्लॉक की 12 ग्राम पंचायत के 22.34 किमी लंबाई में, नजीबाबाद ब्लॉक की तीन ग्राम पंचायत की आठ किमी लंबाई में और मौहम्मदपुर देवमल ब्लॉक की दो पंचायत के ढाई किमी लंबाई में बहती हुई जिला अमरोहा में प्रवेश करती है।
ये हैं विलुप्त नदियों के लिए योजना
सीडीओ केपी सिंह के अनुसार जिले की धारा, बनैली, गागन तथा मालन नदीं विलुप्त हो गई है। मालन नदी मौहम्मदपुर देवमल, नजीबाबाद, किरतपुर ब्लॉकों से, गागन नदी स्योहारा, नूरपुर ब्लाकों से तथा धारा बनैली नदी अफजलगढ ब्लॉक से बहती है। शासन ने विलुप्त हो रही चारों नदियों को मूल रूप में लाने की योजना में अधिग्रहीत किया है। चारों नदी 101 गांवों के पास से होकर बहती है। दो राज्यों की तकनीकी संस्थानों की टीम इस काम में लगी।
विलुप्त नदियों का पता लगा, काम तय
केपी सिंह ने बताया कि राज्य सरकार ने विलुप्त हो रही नदियों के जीर्णोद्धार की जिम्मेदारी आईआईटी कानपुर तथा एनआईएच रुड़की को सौंपी है। सेटेलाइट फोटोग्राफ से विलुप्त नदियों के बहने तथा आसपास के क्षेत्र का पता लिया गया है। सिंचाई विभाग को डिटेल प्रोजेक्ट रिपोर्ट अर्थात डीपीआर तैयार करने के निर्देश दे दिए गए हैं। चारों नदियों को बरसात से पहले मूल स्वरूप में लाने के प्रयास है।
विलुप्त नदियों के लिए कार्य तय है। बताया कि विलुप्त नदियों में गिरने वाले गंदे नालों को रोका जाएगा। चारों नदियों के पांच किमी की परिधि में आने वाले गांवों के तालाबों का जीर्णोद्धार होगा। नदियों में बरसात के पानी का ओवर फ्लो रोकने को चैक डैम बनेंगे। नदियों के किनारों पर बांस का पौधरोपण होगा। इससे नदियों को मजबूती मिलेगी। कटान नहीं होगा। जल संरक्षण होगा। भूमिगत जल स्तर बढ़ेगा। ट्यूबवेल के बोरिंग की लागत कम होगी।