फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   World ›   Rest of World ›   Why the Buddhists and Muslims Enemy?

बौद्धों और मुस्लिमों में दुश्मनी क्यों शुरू हुई?

Wed, 13 Sep 2017 04:26 PM IST
बीबीसी, हिन्दी
बीबीसी, हिन्दी Updated Wed, 13 Sep 2017 04:26 PM IST
विज्ञापन
Why the Buddhists and Muslims Enemy?
- फोटो : AFP

अहिंसा का सिद्धांत अन्य धर्मों की तुलना में बौद्ध धर्म के लिए अधिक महत्वपूर्ण है। बौद्ध भिक्षु किसी की हत्या न करने की शिक्षा लेते हैं, इसीलिए सवाल है कि क्यों बौद्ध भिक्षु मुसलमानों के खिलाफ घृणा फैला रहे हैं और हिंसक भीड़ में शामिल हो रहे हैं? यह सब हो रहा है म्यांमार और श्रीलंका में जो एक दूसरे से करीब एक हजार मील दूर हैं। इन दोनों देशों में रहने वाले मुसलमान आमतौर पर शांतिप्रिय माने जाते हैं और अल्पसंख्यक हैं।

विज्ञापन


इनमें से कोई भी देश इस्लामी चरमपंथ का सामना नहीं कर रहा है। ऐसे में मुसलमानों पर हो रहे हमले व्याकुलता पैदा करते हैं। कई साल पहले श्रीलंका में पशुओं को हलाल करने का मुद्दा प्रमुख बन गया था। बौद्धों के संगठन बोदु बाला सेना के सदस्य बौद्ध भिक्षुओं के नेतृत्व में रैलियां निकाली गईं, मुसलमानों के खिलाफ सीधी कार्रवाई का आह्वान किया गया और उनके व्यापारिक प्रतिष्ठानों के बहिष्कार की अपील की गई।
विज्ञापन


पढ़ें: म्यांमार: रोहिंग्या विद्रोहियों ने किया एकतरफा संघर्ष विराम का ऐलान
विज्ञापन
विज्ञापन


म्यांमार का लादेन
म्यांमार की हालत चिंताजनक है। यहां 969 ग्रुप नाम का एक संगठन कथित तौर पर धार्मिक दुर्भावनाएं फैला रहा है। इसका नेतृत्व आसिन बेराथु नाम के एक बौद्ध भिक्षु करते हैं। उन्हें धार्मिक घृणा फैलाने के आरोप में 2003 में जेल की सजा हुई थी। वो 2012 में रिहा हुए थे। वो खुद को म्यांमार का ओसामा बिन लादेन बताते हैं। 2013 में मार्च में मेकटिला कस्बे में मुसलमानों पर उग्र भीड़ के हमले में 40 लोगों की मौत हो गई थी। हिंसा की शुरुआत सोने की एक दुकान से हुई थी। दोनों देशों में हुई हिंसा में आर्थिक संसाधनों को निशाना बनाया गया। यहां बहुसंख्यकों की महत्वाकांक्षाओं के लिए धार्मिक अल्पसंख्यकों को बलि का बकरा बनाया गया। 

2013 में ही रंगून के उत्तर में स्थित ओक्कन में एक मुसलमान लड़की की साइकिल एक बौद्ध भिक्षु से टकरा गई थी। इसके बाद भड़की हिंसा में कट्टर बौद्धों ने मस्जिदों पर हमले किए थे और करीब 70 घरों में आग लगा दी थी। इस हमले में एक व्यक्ति की मौत हो गई और नौ अन्य घायल हुए। बौद्ध धर्म की शिक्षा में आक्रामक विचारों को हानिकारक बताया गया है। इससे निजात पाने के कई उपाए बताए गए हैं।  ध्यान से बुरे विचारों को खत्म कर करुणा को बढ़ाया जा सकता है। 

पढ़ें: म्यांमार में रोहिंग्या मुसलमानों के रखवाले हैं अताउल्लाह अबू अम्मार जुनूनी

ईसाई धर्म में भी कहा गया है, अपने दुश्मनों से प्यार करो और जो आपको कष्ट दे उनके लिए प्रार्थना करें । हर धर्म पहले या बाद में राज्य सत्ता के साथ एक प्रगाढ़ संबंध विकसित कर लेता है। बौद्ध भिक्षु समर्थन के लिए राजा की ओर देखते हैं, वहीं राजा अपनी वैधता के लिए बौद्ध भिक्षुओं की तरफ देखता है। जिहादी ईसाई हों या इस्लामी चरमपंथी या फिर स्वतंत्रता प्रिय देशों के नेता, सब के सब अच्छे काम के लिए हिंसा को जायज ठहराते हैं। बौद्ध शासक और भिक्षु इसके अपवाद नहीं हैं। 

Trending Videos

धर्म के नाम पर हिंसा

Why the Buddhists and Muslims Enemy?
Buddhists and Muslims - फोटो : AFP

धर्म के राजा के रूप में जाने जाने वाले म्यांमार के शासक बौद्ध धर्म के सिद्धांतों के आधार पर युद्ध को जायज ठहराते हैं। जापान में बहुत से समुराई बौद्ध धर्म के जेन मत को मानते हैं। वे कई तरह से हिंसा को जायज ठहराते हैं, वे एक व्यक्ति की हत्या को भी करुणा की कार्रवाई बताते हैं। इस तरह की दलीलें दूसरे विश्व युद्ध में दी गई थीं।

श्रीलंका और वर्मा में उभरे राष्ट्रवादी आंदोलनों में बौद्ध धर्म ने एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और ब्रितानी साम्राज्य को उखाड़ फेंकने की अपील की। बाद में यह हिंसक हो गया। रंगून में 1930 में बौद्ध भिक्षुओं ने चार गोरों की हत्या कर दी थी। श्रीलंका में 1983 में फैला जातीय तनाव गृह युद्ध में बदल गया। तमिल विरोधी हिंसा के बाद, अलगाववादी तमिलों ने देश के पूर्व और उत्तर में सिंहली बहुल सरकार से अलग होने की मांग की।

सत्ता और धर्म
इस दौरान श्रीलंकाई मुसलमानों के खिलाफ हिंसा की कमान तमिल विद्रोहियों ने संभाल ली थी। लेकिन 2009 में इस हिंसा के खत्म होने के बाद लगता है कि बहुसंख्यक सांप्रदायिकता को मुसलमान अल्पसंख्यकों के रूप में एक नया लक्ष्य मिल गया है। वर्मा में बौद्ध भिक्षुओं ने सैन्य शासन को चुनौती देने के लिए अपनी नैतिक सत्ता का इस्तेमाल किया और 2007 में लोकतंत्र की मांग की।

उस समय शांतिपूर्ण प्रदर्शनों में कई बौद्ध भिक्षुओं की जान भी गई। आजकल कुछ बौद्ध भिक्षु अपनी नैतिक सत्ता का इस्तेमाल बिल्कुल अलग तरीके से कर रहे हैं। वे अल्पसंख्यक हो सकते हैं, लेकिन ऐसे बौद्ध भिक्षुओं की संख्या हजारों में है, जो खुद को एंग्री यंग मैन मानते हैं। दोनों देशों में शासन कर रही पार्टियों और बौद्ध भिक्षुओं के बीच का संबंध अभी भी साफ नहीं है।

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed