बीएचयू अस्पताल: मरणासन्न स्थिति में थी बुजुर्ग महिला, घर वालों ने छोड़ दी थी उम्मीद, इलाज के बाद चेहरे पर लौटी खुशी
70 वर्षीय महिला को देवरिया में निजी अस्पताल में इलाज के बाद भी सुधार नहीं हुआ तो परिजन फिर बीएचयू अस्पताल लेकर आए। महिला उस समय मरणासन्न स्थिति में थी।
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वाराणसी के बीएचयू अस्पताल में हर दिन हजारों मरीज इलाज के लिए आते हैं। इसमें कुछ मरीज तो पहली बार आते हैं, जबकि बहुत से मरीज दूसरे अस्पतालों से रेफर होकर यहां इलाज कराने आते हैं। ऐसी ही देवरिया निवासी एक 70 वर्षीय महिला को लेकर परिजन जब हृदय रोग विभाग की ओपीडी में पहुंचे तो महिला ने खुद ही अपनी जुबानी डॉक्टर को समस्या बताई।
यह देख और सुन इलाज करने वाले डॉक्टर ओमशंकर के साथ ही परिजन भी बहुत खुश हुए। बीएचयू अस्पताल में हृदय रोग विभाग के विभागाध्यक्ष प्रो. ओमशंकर ने बताया है कि तीन साल पहले ही महिला को लेकर परिजन इलाज के लिए हृदय रोग विभाग आए थे, तो उनके हाथ-पांव सूजे थे, सांस भी नहीं ले पा रही थी।
भर्ती होने के 2-3 दिन के बाद जब उनकी हालत थोड़ी ठीक हो गई तो वो मना करने के बाद भी जबरन छुट्टी करवाकर घर चली गई। घर जाने के सप्ताह भर बाद तबीयत फिर बिगड़ गई। उनकी सांस फूलने लगी और साथ में लकवा (फालिज) मार गया था। देवरिया में निजी अस्पताल में इलाज के बाद भी सुधार नहीं हुआ तो परिजन फिर बीएचयू लेकर आए। महिला उस समय मरणासन्न स्थिति में थी।
भर्ती लेने को तैयार नहीं था कोई डॉक्टर
घरवालों ने भी उसके बचने की उम्मीद छोड़ दी। उनकी दोनों किडनी काम करनी बंद कर दी थी। यहां कोई भर्ती लेने को तैयार नहीं था, तो हमने एक बार फिर से उनको भर्ती करवाया। डायलिसिस भी करवाना पड़ा। अब महिला की सेहत में तेजी से सुधार हुआ है।
हृदय रोग विभाग के विभागाध्यक्ष प्रो. ओमशंकर ने कहा कि एक चिकित्सक के तौर पर आज तक मुझे ऐसे लाखों मरीजों की सेवा करने और जान बचाने का अवसर मिला है। जब भी ऐसे किसी जरूरतमंद लोगों की मदद कर पाता हूं तो बड़ी सुखद अनुभूति होती है। यही मेरे जीवन की कमाई है। माता-पिताजी का शुक्रिया है कि उन्होंने मुझे इस लायक बनाया।
...तो निजी अस्पताल में खर्च होता एक करोड़
प्रोफेसर ओमशंकर ने महिला के इलाज के बारे में बताते हुए इसे अपने जीवन की बड़ी उपलब्धि बताया। साथ ही उन्होंने यह भी बताया कि जितने दिन महिला बीएचयू में भर्ती रही, अगर उतने दिन किसी निजी अस्पताल में भर्ती रहती तो शायद इलाज का खर्च एक करोड़ से भी अधिक होता (जो इस देश के 99 प्रतिशत आबादी के बजट से बाहर है), जबकि यहां उनका एक लाख भी खर्च नहीं हुआ होगा। ऐसे में सरकारी अस्पतालों को सरकार द्वारा अधिक मजबूत करने और आम जनता को स्वास्थ्य के मौलिक अधिकार को सुनिश्चित करने की जरूरत है।
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