मुजफ्फरनगर दंगे के चार साल, नहीं मिट पाईं आज तक दिलों की दूरियां
सात सितंबर 2013। यह वही मनहूस तारीख है, जिसे मुजफ्फरनगर के लोग कभी नहीं भूल पाएंगे। इसी दिन जिलेभर में सांप्रदायिक हिंसा का ऐसा नंगा नाच हुआ कि लोग एक-दूसरे के खून के प्यासे हो गए। किसी के बुढ़ापे की लाठी छिनी, किसी की मांग का सिंदूर उजड़ा। कइयों के घरों के चिराग बुझे तो कुछ के सिर से पिता का साया उठ गया। सांप्रदायिक हिंसा में 65 बेगुनाहों की जानें गईं। इस भयावह मंजर को बीते चार साल गुजर चुके हैं, लेकिन आज भी दिलों की दूरियां नहीं मिट पाई हैं। सात सितंबर 2013 में नफरत का जो उन्माद गांव और गलियों में देखा, वह पहले यहां के इतिहास में नहीं मिलता। शुरुआत 27 अगस्त को कवाल गांव से शुरू हुई। शाहनवाज की हत्या के बाद भीड़ ने मलिकपुरा गांव के ममेरे भाइयों सचिन और गौरव की हत्या कर डाली थी। तिहरे हत्याकांड को लेकर सियासत ऐसी गरमाई कि जिलेभर का अमन-चैन खतरे में पड़ गया। 29 अगस्त को खालापार और 31 अगस्त को नंगला मंदौड़ की पंचायतों में जहरीले भाषण दिए गए। एकाएक माहौल गर्माता गया और नफरत दिलों में घर करती गई। इसी कड़ी में बहू-बेटी बचाओ सम्मान के नाम से सात सितंबर को नंगला मंदौड़ मैदान में महापंचायत बुलाई गई। जिले में धारा 144 लागू होने और तमाम प्रतिबंधों के बावजूद हजारों की भीड़ खेतों के रास्ते महापंचायत में पहुंच गई। ट्रैक्टर-ट्रॉलियों से महापंचायत में जाते लोगों पर बसी कलां गांव में मारपीट और पथराव हुआ। इन्हीं लोगों ने पंचायत में जाकर आपबीती सुनाई तो गुस्सा और भड़क गया। दिन ढलते ही सांप्रदायिक हिंसा का दौर शुरू हो गया।
पंचायत से लौटती भीड़ पर मीरापुर के मुझेड़ा, पुरबालियान और जौली गंगनहर पर हमले हुए। इन हमलों में 12 लोगों की जान गई और कई लापता हो गए। बाद में इनकी लाशें नहर और रजवाहों से बरामद हुई। घटना के प्रतिशोध में भौराकलां, शाहपुर, तितावी, बुढ़ाना, फुगाना और भोपा थाना क्षेत्रों में जमकर हिंसा हुई। 65 से अधिक लोग दंगे में मारे गए, जबकि 50 हजार लोगों को राहत शिविरों में पहुंचकर जान बचानी पड़ी। तत्कालीन सपा सरकार ने पीड़ितों के लिए सरकारी खजाने का मुंह खोल दिया।
इन गांवों में हुई थी ज्यादा हिंसा
लोगों को जैसे-तैसे कर शिविरों से वापस भेजा गया। जिन गांवों में ज्यादा हिंसा हुई, वहां एक भी परिवार वापस नहीं लौटा। सरकारी इमदाद पाने के लोगों ने अपने मकान अपनी बहुलता वाले गांवों में बना लिए। अब हालात ऐसे हैं कि ज्यादातर लोग अपने घर और जमीन औने-पौने दामों में बेचकर दूसरी जगहों पर बस गए हैं। कई गांवों के धार्मिक स्थल सूने पड़े हैं। दंगा क्यों हुआ, किसने कराया, कौन गुनहगार है, इन सब बातों का सच अदालत के फैसले के बाद ही सामने आएगा।
उस दिन को अब भूलना ही बेहतर
दंगे को चार साल गुजर गए हैं। जिंदगी पटरी पर दौड़ने लगी है। हिंसा में मारे गए लोगों को तत्कालीन सपा सरकार ने सरकारी नौकरियां दी थीं। नौकरी तो मिल गईं अपनों को खोने का दर्द कम नहीं हो रहा। अलग-अलग विभागों में नौकरी पाए दंगा पीड़ितों का कहना है कि अब उस दिन को भूलना ही बेहतर है। जिंदगी जैसे-तैसे कर चल रही है। कलक्ट्रेट में कार्यरत अर्जुन, कैलाश, सतीश, सारांश, याकूब आदि वह कर्मचारी हैं, जिन्होंने अपने परिवार के किसी न किसी शख्स को खोया है। वह कहते हैं कि दंगे से किसी को कुछ हासिल नहीं होता, जिनके घर उजड़ते हैं, वहीं इसके दर्द को समझ सकते हैं।
फेसबुक मुख्यालय ने नहीं दिया डाटा
दंगे की मुख्य वजह बताई गई कवाल कांड की कथित क्लिपिंग की हकीकत आज तक सामने नहीं आ पाई है। थक-हार कर पुलिस आरोपी विधायक संगीत सोम को मामले में क्लीनचिट दे दी है। कवाल कांड का कथित वीडियो ही पुलिस ने दंगा भड़काने का जिम्मेदार माना था। इस वीडियो को विधायक संगीत सोम के फेसबुक एकाउंट से शेयर की गई थी। पुलिस ने संगीत सोम के खिलाफ शहर कोतवाली में मुकदमा अपराध संख्या 1118-13 पर धारा 153ए, 420, 120बी आईपीसी और 66ए आईटी एक्ट में मुकदमा पंजीकृत किया था। इस मामले में विधायक को गिरफ्तार कर रासुका में भी निरुद्ध किया गया था। एसआईटी इंटरपोल की मदद से फेसबुक मुख्यालय से संपर्क किया, लेकिन फेसबुक ने पुराना डाटा नहीं होने की बात कहकर टरका दिया। यही वजह है कि चार साल बाद भी इस मामले की हकीकत सामने नहीं आ पाई।
इबादतगाहों में नहीं गूंजती आयतें
सात सितंबर को शाम होते-होते तमाम परिवारों की दुनिया उजड़ गई। चारों तरफ कत्ल-ए-आम का शोर और बेबस जिंदगियां सहारे की तलाश में पनाह मांग रही थीं। उन्माद से कई गांवों की गलियों और इबादतगाह आज भी वीरान हैं। यहां अब न तो आयतों का शोर सुनाई पड़ता है और न ही अजान के बोल गूंजते हैं। दंगाइयों ने आशियानों के साथ ही वाहनों और धर्मस्थलों को भी निशाना बनाया था।
दंगाइयों की भीड़ द्वारा किए गए नुकसान का आकलन
दंगाइयों की भीड़ द्वारा किए गए नुकसान का आकलन प्रशासनिक मशीनरियों ने कर लिया, लेकिन हिंसा में तबाह हुई जिंदगियों का हिसाब कैसे चुकाए जाए, यह आज भी पहेली बना हुआ है। वक्त के साथ तस्वीरें भले ही धुंधली हो गई हों, लेकिन जख्म आज भी हरे हैं। सात सितंबर को भड़की हिंसा में दंगाइयों ने दो-तीन घंटे के भीतर ही करोड़ों का नुकसान कर दिया। भीड़ की शक्ल में आए उन्मादियों ने जानसठ क्षेत्र में 6.20 लाख रुपये की कीमत के वाहन फूंके, जबकि बुढ़ाना के सात गांवों में 6,43,500 रुपये का धार्मिक स्थलों को नुकसान पहुंचाया।
सदर तहसील में धार्मिक स्थलों में 95 हजार की क्षति पहुंचाई गई। इसके अलावा भी बुढ़ाना, जानसठ, खतौली, सदर में लोगों की करीब 1, 30,92,500 रुपये की चल-अचल संपत्ति को फूंक दिया।
सात सिंतबर को प्रशासन ने भड़की हिंसा में करीब एक करोड़ 44 लाख 51 हजार रुपये की क्षति का आकलन किया। हिंसा में निशाना बनाए गए धार्मिक स्थल आज भी वीरान अवस्था में पड़े हैं। भौराकलां के गांव मोहम्मदपुर और शाहपुर के गांव कुटबा की मस्जिदों में पिछले चार साल से परिंदा भी पर मारने नहीं पहुंचा। इसके अलावा भी फुगाना, काकड़ा, हलौली, खरड़, मुंडभर समेत कई गांवों में इबादतगाहों के दरवाजों पर ताले पड़े हैं। दंगे की दहशत से यहां विस्थापित लोग अपने गांवों में नहीं लौट सके।
एक झटके में जिंदगी हो गई बेपटरी
चार साल पहले मुजफ्फरनगर दंगे के कारण एक झटके में जिंदगी बेपटरी हो गई थी। एक समुदाय के काफी लोगों को रातों रात गांव छोड़कर शरणार्थी बनना पड़ा था। समय बीता तो दंगे के जख्म भरने लगे, मगर समस्याओं से भरा जीवन और रोजगार का अभाव आज भी है।
सात सितंबर 2013 को मुजफ्फरनगर के नंगला मंदौड़ महापंचायत होने के बाद भड़की सांप्रदायिकता की चिंगारी ने मुजफ्फरनगर के साथ ही शामली जिले के भी कई गांवों को अपनी चपेट में ले लिया था। गांव लांक, लिसाढ़, फुगाना, हसनपुर और बहावड़ी आदि गांवों में मारकाट हुई थी, जिस कारण दूसरे संप्रदाय के लोगों को गांव से पलायन करना पड़ गया था। इन गांवों के लोगों ने कैराना और कांधला में शरण ली थी। बाद में एनजीओ और सरकार की तरफ से दंगा पीड़ितों को आर्थिक सहायता दिलाई गई। कैराना में भूरा मार्ग पर विधायक नाहिद हसन ने दंगा पीड़ितों के आशियाना बनाने के लिए जमीन दी और मकान बनवाए। यहां नाहिद कॉलोनी में करीब 200 परिवार रहते हैं।
हर किसी की यही पीड़ा है कि हमारा घर छूट गया। औने पौने दाम में मकान बेचने पड़े और अब परेशानियों में जीवन कट रहा है। बच्चों की पढ़ाई नहीं हो रही। रोजगार का कोई साधन नहीं है। मजदूरी करके परिवार का पेट भरना पड़ता है। रोजाना मजदूरी मिलना भी मुश्किल हो रहा है, जबकि जिन गांवों में वह रहते थे वहां कुछ न कुछ रोजगार मिल जाता था।
बांस की झोपड़ी में चलता है स्कूल
भूरा मार्ग पर नाहिद कॉलोनी में रहने वाले दंगा पीड़ित परिवारों के बच्चों की पढ़ाई के लिए प्रशासन ने प्रयास किया। कैराना दूर होने की वजह से कालोनी में ही बांस और पॉलीथिन से झोपड़ी बनाई गई, जिसमें दंगा पीड़ित परिवार के बच्चों को शिक्षा दी जाती है। यहां रहने वालों को दर्द है कि दंगे में सब कुछ खो गया।
फुगाना निवासी सुलेमान का परिवार नाहिद कॉलोनी में रहता है। सुलेमान का कहना है कि फुगाना में उनका पक्का मकान था, जो आज भी खाली पड़ा है। उसे कोई खरीदने को भी तैयार नहीं है। फुगाना लौटने के बारे में कई बार सोचा, लेकिन मन गवाही नहीं देता। चार बेटों को नाहिद कॉलोनी में मकान मिल गया, लेकिन एक बेटा अभी झोपड़ी में ही रहता है।
गांव लाक निवासी गय्यूर ने बताया कि सात सितंबर को गांव के ही एक जाट परिवार ने उन्हें अपने यहां पनाह दी थी, जिस कारण उसका परिवार बच गया था। बाद में पीएसी ने वहां से उनको बाहर निकालकर भेजा था। यहां नाहिद कॉलोनी में रहते जरूर हैं, मगर अपने गांव की याद अब भुलाए नहीं भूल पाते हैं। गांव लिसाढ़ निवासी मोहम्मद यासीन और फुगाना निवासी इमरान, उसके चाचा कय्यूम ने बताया कि गांव में उनके पक्के मकान थे। वह हैंडपंप लगाने का काम करते हैं। सात सितंबर को दंगा होने के बाद उनके परिवार के 35 लोग एक छोटे से मकान में 24 घंटे बंद रहे। आठ सितंबर को पीएसी के जवान उन्हें बाहर निकालकर लाए थे।
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