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आईवीआरआई में एक वैक्सीन पर छिड़ी है जंग
ब्यूरो, अमर उजाला बरेली
Updated Tue, 26 Apr 2016 01:25 AM IST
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पशुओं में खुरपका-मुंहपका (एफएमडी) के लिए बनी वैक्सीन पर आईवीआरआई का एक वैज्ञानिक लंबी जंग छेड़े हुए है। उनका आरोप है कि ये वैक्सीन ठीक नहीं है और इसी वजह से यहां अचानक रोग फैला था। वह कह रहे हैं इस खेल में मंत्रालय से लेकर आईवीआरआई के अफसर तक संलिप्त हैं। 2014 में सीसीएस और एनआईएच के डायरेक्टर की हैसियत से डॉ. भोजराज सिंह ने वैक्सीन की टेस्टिंग में कंटामिनेशन की रिपोर्ट दी थी। जिस वैक्सीन में डॉ. भोजराज ने कंटामिनेशन की रिपोर्ट दी, उसी कंपनी की वैक्सीन को आईवीआरआई बंगलूरू से पास करा दिया गया था।
प्रधान वैज्ञानिक ने कहा था कि 52 नंबर बैच की वैक्सीन कुछ समय में ही खराब हो रही है, इसका मतलब है कि इसमें बैक्टीरिया है, लेकिन कोई भी उनकी सुनने को तैयार नहीं हुआ। पांच नवंबर 2014 में उनकी रिपोर्ट पब्लिश होते ही 10 नवंबर 2014 में जांच बैठा दी गई। मंत्री ने अलग से टेस्टिंग कमेटी बनाई। भोजराज का कहना है कि इस कमेटी में ऐसे लोगों को रखा गया, जिनका संबंध वैक्सीन टेस्टिंग क्षेत्र से था ही नहीं। उन्होंने अपने कॅरिअर में कभी टेस्टिंग नहीं की थी। उधर कमेटी ने डॉ. भोजराज पर जानबूझकर पक्षपात कर गलत रिपोर्ट देने का आरोप लगाया गया। इस पर भराज का पक्ष था कि कमेटी ने आईवीआरआई बंगलुरु में उस वैक्सीन को टेस्ट नहीं किया, जिसमें डॉ. भोजराज ने कंटामेशन की रिपोर्ट दी थी, बल्कि कंपनी से नए बैच की वैक्सीन मंगवाकर टेस्ट कराई और उसे ओके कर दिया। अगर पुराने बैच की वैक्सीन का टेस्ट किया जाता तो शायद रिपोर्ट कुछ और होती। तब से लगातार इस मामले में जांच चल रही है।
वैक्सीन से फैला एफएमडी
डॉ. भोजराज ने अपनी लिखी चिट्ठी में लिखा है कि आईवीआरआई इज्जतनगर में भी उसी कंपनी की वैक्सीन पशुओं को लगा दी गई। इसके बाद ही पशुओं को खुरपका-मुंहपका (एफएमडी) बीमारी हो गई। इसमें 40 से ज्यादा जानवरों की मौत हो गई। इससे आईवीआरआई के साथ ही बाहर के पशु भी प्रभावित हुए। भारत के साथ ही देश से बाहर भी यह वैक्सीन लगाने के बाद अल्जीरिया और ट्यूनीशिया में भी यह खुरपका-मुंहपका (एफएमडी) की बीमारी फैली। कई बार रिसर्च रिपोर्ट में भी इसका उल्लेख किया जा चुका है। इसके बाद इस कंपनी की वैक्सीन पर प्रतिबंध लगाने के बजाय धड़ल्ले से पूरे देश और विदेश में बिक रही है।
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पीएमओ को भी लिख चुके हैं पत्र
आईवीआरआई के प्रधान वैज्ञानिक डॉ. भोजराज सिंह ने इस बारे में एक पत्र पीएमओ को भी लिखा है।मगर कंपनी पर कार्रवाई होने के बजाय डॉ. भोजराज सिंह को ही सवालों के घेरे में डाल दिया गया। डॉ. भोजराज ने एक रिसर्च का हवाला देते हुए लिखा है कि भारत की 80 फीसदी वैक्सीन नकली हैं। यही वजह है कि जिस वैक्सीन से जर्मनी में एफएमडी बीमारी तीन साल में खत्म हो गई। वहीं, भारत में 13 सालों से वही वैक्सीन पशुओं को लग रही है, लेकिन एफएमडी बीमारी घटने की बजाय बढ़ ही रही है। उन्होंने इसमें लिखा कि भारत में इसी कंपनी ने कंटामिनेटेड वैक्सीन बनाकर सप्लाई कर दी, जिससे पशु बीमार हो रहे हैं। उन्होंने सुझाव दिया कि वैक्सीन का टेस्ट कम से कम तीन जगहों पर किया जाए। उन्होंने मामले की सीबीआई या सीबीसीआईडी की जांच की मांग की।
पुलिस प्रशासन ने नहीं किया संपर्क
आईवीआरआई के वैज्ञानिक डॉ. भोजराज सिंह ने जिला और पुलिस प्रशासन को पत्र लिखकर सुरक्षा मांगी थी और चेताया था कि अगर अभी उन्हें सुरक्षा नहीं मिली तो डॉ. दीपक शर्मा जैसी स्थिति हो सकती हैं। । पुलिस ने अब तक उन्हें न तो फोन किया और न ही समस्या की वजह पूछी है।
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प्रधान वैज्ञानिक ने कहा था कि 52 नंबर बैच की वैक्सीन कुछ समय में ही खराब हो रही है, इसका मतलब है कि इसमें बैक्टीरिया है, लेकिन कोई भी उनकी सुनने को तैयार नहीं हुआ। पांच नवंबर 2014 में उनकी रिपोर्ट पब्लिश होते ही 10 नवंबर 2014 में जांच बैठा दी गई। मंत्री ने अलग से टेस्टिंग कमेटी बनाई। भोजराज का कहना है कि इस कमेटी में ऐसे लोगों को रखा गया, जिनका संबंध वैक्सीन टेस्टिंग क्षेत्र से था ही नहीं। उन्होंने अपने कॅरिअर में कभी टेस्टिंग नहीं की थी। उधर कमेटी ने डॉ. भोजराज पर जानबूझकर पक्षपात कर गलत रिपोर्ट देने का आरोप लगाया गया। इस पर भराज का पक्ष था कि कमेटी ने आईवीआरआई बंगलुरु में उस वैक्सीन को टेस्ट नहीं किया, जिसमें डॉ. भोजराज ने कंटामेशन की रिपोर्ट दी थी, बल्कि कंपनी से नए बैच की वैक्सीन मंगवाकर टेस्ट कराई और उसे ओके कर दिया। अगर पुराने बैच की वैक्सीन का टेस्ट किया जाता तो शायद रिपोर्ट कुछ और होती। तब से लगातार इस मामले में जांच चल रही है।
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वैक्सीन से फैला एफएमडी
डॉ. भोजराज ने अपनी लिखी चिट्ठी में लिखा है कि आईवीआरआई इज्जतनगर में भी उसी कंपनी की वैक्सीन पशुओं को लगा दी गई। इसके बाद ही पशुओं को खुरपका-मुंहपका (एफएमडी) बीमारी हो गई। इसमें 40 से ज्यादा जानवरों की मौत हो गई। इससे आईवीआरआई के साथ ही बाहर के पशु भी प्रभावित हुए। भारत के साथ ही देश से बाहर भी यह वैक्सीन लगाने के बाद अल्जीरिया और ट्यूनीशिया में भी यह खुरपका-मुंहपका (एफएमडी) की बीमारी फैली। कई बार रिसर्च रिपोर्ट में भी इसका उल्लेख किया जा चुका है। इसके बाद इस कंपनी की वैक्सीन पर प्रतिबंध लगाने के बजाय धड़ल्ले से पूरे देश और विदेश में बिक रही है।
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पीएमओ को भी लिख चुके हैं पत्र
आईवीआरआई के प्रधान वैज्ञानिक डॉ. भोजराज सिंह ने इस बारे में एक पत्र पीएमओ को भी लिखा है।मगर कंपनी पर कार्रवाई होने के बजाय डॉ. भोजराज सिंह को ही सवालों के घेरे में डाल दिया गया। डॉ. भोजराज ने एक रिसर्च का हवाला देते हुए लिखा है कि भारत की 80 फीसदी वैक्सीन नकली हैं। यही वजह है कि जिस वैक्सीन से जर्मनी में एफएमडी बीमारी तीन साल में खत्म हो गई। वहीं, भारत में 13 सालों से वही वैक्सीन पशुओं को लग रही है, लेकिन एफएमडी बीमारी घटने की बजाय बढ़ ही रही है। उन्होंने इसमें लिखा कि भारत में इसी कंपनी ने कंटामिनेटेड वैक्सीन बनाकर सप्लाई कर दी, जिससे पशु बीमार हो रहे हैं। उन्होंने सुझाव दिया कि वैक्सीन का टेस्ट कम से कम तीन जगहों पर किया जाए। उन्होंने मामले की सीबीआई या सीबीसीआईडी की जांच की मांग की।
पुलिस प्रशासन ने नहीं किया संपर्क
आईवीआरआई के वैज्ञानिक डॉ. भोजराज सिंह ने जिला और पुलिस प्रशासन को पत्र लिखकर सुरक्षा मांगी थी और चेताया था कि अगर अभी उन्हें सुरक्षा नहीं मिली तो डॉ. दीपक शर्मा जैसी स्थिति हो सकती हैं। । पुलिस ने अब तक उन्हें न तो फोन किया और न ही समस्या की वजह पूछी है।