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अवसाद को भी दे रही जन्म वर्चुअल दुनिया

Sat, 26 Mar 2016 02:24 AM IST
योगेंद्र पांडेय, अमर उजाला ब्यूरो, इलाहाबाद
योगेंद्र पांडेय, अमर उजाला ब्यूरो, इलाहाबाद Updated Sat, 26 Mar 2016 02:24 AM IST
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Depression , giving birth to the Virtual World
आत्महत्या
लोगों में प्रेम, सहयोग, यश, सम्मान पाने की भावनाएं जितनी ही मजबूत हैं, ईर्ष्या, हताशा और कुंठा ने भी धीरे-धीरे करके उतनी ही मजबूती से जगह बना ली है। लोग दूसरे की कामयाबी को देख कर खुश नहीं बल्कि जलते-भुनते रहते हैं, फिर वह चाहे वह पद, प्रतिष्ठा से जुड़ा मामला हो या फिर दौलत। ज्यादा ऊंचे पदों पर बैठे या फिर कमाई करने वाले लोगों से अपनी तुलना में आदमी अकारण ही अवसाद को जन्म दे रहा है। दरअसल जब उसे दूसरे व्यक्ति के मुकाबले वांछित चीजें नहीं मिलतीं तो उसमें ईर्ष्या, कुंठा पनपने लगती हैं। वर्चुअल दुनिया ने इस प्रवृत्ति को और ज्यादा बढ़ा दिया है।
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 सोशल साइट्स का उदाहरण सामने है। किसी के फेसबुक पर हजारों फॉलोअर्स हैं तो किसी के पास सिर्फ गिने-चुने ही। कई फेसबुक यूजर्स के पोस्ट को बड़ी संख्या में लोग लाइक नहीं करते और कमेंट से दूर रहते हैं। भले ही वह चाहे दुनिया की अच्छी चीजों में शुमार हो। लोगों का फीडबैक न मिलने पर ईर्ष्या, जलन, तनाव जैसी भावनाएं धीरे-धीरे करके घर बनाने लगती हैं। कई तो तनाव और अवसाद में जीने लगे हैं। 
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बदलते वक्त में सोशल साइट फेसबुक, ह्वाट्सएप, ट्विटर आदि लोगों से जुड़े रहने का सबसे सशक्त माध्यम हैं। एकाकीपन को दूर करने के साथ लोग इस पर एक-दूसरे से जुड़कर अच्छा महसूस करते हैं लेकिन जैसे ही वह ऐसे लोगों से अपनी तुलना करने लगते हैं, जिनके फेसबुक पर दोस्तों (फालोवर्स )  की संख्या लाखों और करोड़ों में ह, उनमें हताशा, कुंठा पनपने लगती है। सोशल साइट्स पर सक्रिय बहुत से ऐसे लोग होते हैं जो अपने को ज्यादा बढ़ा-चढ़ाकर दिखाना चाहते हैं। वह ज्यादा से ज्यादा लोगों से जुड़ना चाहते हैं। भले ही उनकी ऐसी पहचान नहीं है। बस दिखावे के लिए ही वे शौकिया लोगों को दोस्त बनाने की कोशिश करते हैं ताकि लोग उन्हें भी धोनी, कोहली, सचिन, अमिताभ की तरह ही लाइक करें, उन पर कमेंट करें, जिससे कि वह भी वर्चुअल दुनिया में अपनी बादशाहत का झंडा बुलंद कर सकें लेकिन उनके साथ ऐसा नहीं हो पाता है।
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मोती लाल नेहरू मेडिकल कॉलेज के मानसिक रोग विभाग के डॉ.अनुराग वर्मा कहते हैं, हर इंसान में एक चाहत होती है। वर्चुअल दुनिया में वह उसे पूरी करना चाहता है लेकिन जब उसकी चाहत पूरी नहीं होती तो कई तरह की भावनाएं पनपने लगती हैं।  ईर्ष्या, कुंठा, तनाव इसी का परिणाम है। कभी-कभी लोग अवसाद में भी चले जाते हैं। मानसिक रोग विभाग के अध्यक्ष प्रो.वीके सिंह कहते हैं, ऐसी चीजें दूसरों की इच्छाओं पर निर्भर हैं। लोग सैलिब्रिटी के स्टेटस से जुड़े होते हैं, उनके बारे में जानना चाहते हैं। इसलिए लोग उनकी पोस्ट को लाइक करते हैं या फिर कमेंट करते हैं जबकि सोशल साइट्स से जुड़े दूसरे लोगों के साथ ऐसा नहीं होता है। इससेउनकी इच्छा के मुताबिक न तो लोग लाइक और न ही कमेंट करते हैं। 

इलाहाबाद विश्वविद्यालय के समाजशास्त्री प्रो.सत्यनारायण कहते हैं, लोग सोशल साइट़्स को सामाजिक पूंजी की तरह देखते हैं। यह लोगों को समान रूप से आगे बढ़ने का मौका देता है लेकिन जब उनके मुताबिक उनकी इच्छाएं पूरी नहीं हो पाती हैं तो ऐसी नकारात्मक भावनाओं से ग्रसित हो जाते हैं। इविवि के मनोविज्ञान विभाग के पूर्व अध्यक्ष प्रो.आरसी त्रिपाठी कहते हैं, यह लोगों को युनिवर्सल पहचान दिलाता है। लोग अपनी पहचान बनाना चाहते हैं। यह एक अच्छा माध्यम है। इसलिए लोग एक-दूसरे से जुड़ते हैं लेकिन जब तुलनात्मक रूप से उन्हें कहीं से निराशा मिलती है तो तमाम दुश्चिंताओं से ग्रसित हो जाते हैं। धीरे-धीरे यह अवसाद की स्थिति ले लेती है।

सोशल साइट्स सामाजिक दायरे को बढ़ाने का एक अच्छा माध्यम है लेकिन आजकल कई लोग दिखावे और प्रतिष्ठा, सम्मान पाने के लिए हर वक्त फेसबुक, ह्वाट्सएप या फिर ट्विटर पर लगे रहते हैं। वे अपना जरूरी काम पीछे छोड़ कर इस बात पर ज्यादा लगे होते हैं कि उनको कितने लोगों ने लाइक किया, कितने कमेंट आए। आंख खुलते ही फेसबुक पर जुट जाते हैं।


उठना-बैठना छोड़कर इन्हीं साइट्स से ही जुड़ाव सीमित हो जाता है।  नेट एडिक्शन होने पर इंटरनेट से दूर होने पर या बिजली चले पर घबड़ाने लगते हैं। मोती लाल नेहरू मेडिकल कॉलेज के मनोरोग विभाग के डॉ.अनुराग वर्मा कहते हैं कि ऐसे लोगों का वास्तविक और वर्चुअल दुनिया में बैलेंस गड़बड़ा जाता है। उनमें तनाव, क्रोध आना स्वाभाविक  है। ईर्ष्या, जलन जैसी भावनाएं भी पनपती हैं। ऐसे लोगों को बहुत ही संभलकर चलने की जरूरत है। वोल टर्की नामक एक  ऐसे लोगों के लिए बहुत ही सहायक है जो एक लिमिटेड टाइम तक ही सोशल साइट्स के इस्तेमाल की छूट देता है।
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