{"_id":"d84b82cd552912b969baaeed5c3f5cdd","slug":"every-person-is-the-child-of-god","type":"story","status":"publish","title_hn":"उस संत के प्रयास से बंद हुई कामख्या में नरबलि प्रथा","category":{"title":"Metaphysical","title_hn":"परामनोविज्ञान","slug":"metaphysical-parasychology"}}
उस संत के प्रयास से बंद हुई कामख्या में नरबलि प्रथा
शिवकुमार गोयल
Updated Wed, 11 Dec 2013 03:39 PM IST
विज्ञापन
ढाई सौ वर्ष पूर्व कुरुक्षेत्र में जन्मे योगिराज वनखंडी महाराज परम विरक्त संत थे। उन्होंने दस वर्ष की आयु में ही उदासीन संप्रदाय के सिद्ध संत स्वामी मेलाराम जी से दीक्षा लेकर समस्त जीवन धर्म व समाज के लिए समर्पित करने का संकल्प लिया।
विज्ञापन
एक बार पटियाला के राजा कर्मसिंह उन्हें अपने राजमहल में ले गए। जब उन्होंने उनसे रात को महल में ही रुकने का आग्रह किया, तो वनखंडी महाराज ने कहा, साधु को किसी भी गृहस्थ के घर नहीं ठहरना चाहिए। हालांकि राजा का हठ देखकर वह रुक गए, पर आधी रात को चुपचाप महल से निकलकर वन में जा पहुंचे।
विज्ञापन
संत वनखंडी एक बार तीर्थयात्रा करते हुए असम के कामाख्या देवी के मंदिर में पहुंचे। उन्हें पता चला कि कुछ अंधविश्वासी लोग देवी को प्रसन्न करने के नाम पर निरीह पशु-पक्षियों की बलि देते हैं। कभी-कभी कुछ दबंग व धनी लोग व्यक्तिगत हित साधने के लिए नरबलि जैसा पाप कर्म करने से भी बाज नहीं आते।
विज्ञापन
वनखंडी महाराज ने निर्भीकतापूर्वक सभी के समक्ष कहा, सभी प्राणी देवी मां की संतान हैं। मां करुणामयी होती है, वह किसी की बलि से खुश कैसे हो सकती है। उसी दिन से सभी ने संकल्प लिया कि नरबलि जैसा घोर पाप कर्म कभी नहीं होगा।
वनखंडी जी सिंध-सक्खर पहुंचे। वहां उन्होंने सिंधु नदी के तट पर उदासीन संप्रदाय के साधुबेला तीर्थ की स्थापना की। यह उनकी कीर्ति का साकार स्मारक है।