शनिवार 4 जून को वटसावित्री व्रत, जानिए कुछ खास बातें
- वट में ब्रह्मा, विष्णु और शिव के साथ सावित्री और यमराज का वास
- धन और मोक्ष की चाहत पूरी होगी
- वट वृक्ष की जड़ों को दूध और जल से सींचें
- श्री कृष्ण ने वट वृक्ष के पत्तों पर मार्कण्डेय ऋषि को दर्शन दिए
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ज्येष्ठ कृष्ण अमावस्या तिथि के दिन वट वृक्ष की पूजा का विधान है। इस वर्ष यह दिन 4 जून को है। शास्त्रों में कहा गया है कि इस दिन वट वृक्ष की पूजा से सौभाग्य एवं स्थायी धन और सुख-शांति की प्राप्ति होती है। संयोग की बात है कि इसी दिन शनि महाराज का जन्म हुआ है। और सावित्री ने यमराज से अपने पति सत्यवान के प्राण की रक्षा की। सावित्री और सत्यवान की कथा से वट वृक्ष का महत्व लोगों को ज्ञात हुआ क्योंकि इसी वृक्ष ने सत्यवान को अपनी शाखाओं और शिराओं से घेरकर जंगली पशुओं से उनकी रक्षा की थी। इसी दिन से जेष्ठ कृष्ण अमावस्या के दिन वट की पूजा का नियम शुरू हुआ। वट सावित्री के दिन महिलाएं अपने पति की लंबी आयु के लिए वट वृक्ष की पूजा करती हैं।
वट पर सावित्री और यमराज का वास
इसलिए भी होती है वट की पूजा
वट वृक्ष की पूजा इसदिन आमतौर पर केवल महिलाएं करती हैं जबकि पुरूषों को भी इस दिन वट वृक्ष की पूजा करनी चाहिए। इसकी पूजा से वंश की वृद्धि होती है। शास्त्रों में वट वृक्ष को पीपल के समान ही महत्व दिया गया है। पुराणों में यह स्पष्ट लिखा है कि वट वृक्ष की जड़ों में ब्रह्मा जी, तने में विष्णु और डालियों एवं पत्तों में शिव का वास है। इसके नीचे बैठकर पूजन, व्रत कथा कहने और सुनने से मनोकामना पूरी होती है। प्रलय काल में भगवान श्री कृष्ण ने वट वृक्ष के पत्तों पर मार्कण्डेय ऋषि को दर्शन दिए थे।