सुसाइड केस: अमित की कॉपी में व्हेल की ड्राइंग, 20 दिन से छोड़ दिया था दूध और भी कई खुलासे
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पांचवीं कक्षा के छात्र अमित की आत्महत्या के बाद पुलिस जांच में चौंकाने वाली बातें सामने आई हैं। अमित के पिता श्याम नंद ने पूछताछ में बताया है कि उसके व्यवहार में अचानक बदलाव आ गया था। दूध पीने का शौकीन अमित करीब 20 दिन से कभी दूध पीता था तो कभी नहीं। अमित स्कूल टिफिन भी नहीं ले जा रहा था।
वीरवार को अमित के घर पहुंचीं एसपी शिमला सौम्या सांबशिवन ने अपनी टीम के साथ उसके स्कूल बैग को भी खंगाला। किताबों और कॉपियों को जांचा गया। अमित की कॉपी में व्हेल की आकृति बनी मिली है। इसमें व्हेल का मुंह खुला है और उसकी पूंछ काटेदार है। कापी में एक पहली भी मिली है। ये सुसाइट नोट में मिली पहेली से अलग थी।
पुलिस ने अमित की पांच कॉपियों को भी अपने कब्जे में ले लिया है। पुलिस ने अमित के पिता श्याम नंद के मोबाइल फोन और उसमें डाली गईं दो सिमों को भी अपने कब्जे में ले लिया है। इस दौरान अमित के पिता और घर के अन्य सदस्य भी वहां मौजूद थे। पुलिस करीब तीन घंटे तक अमित के घर पर सभी पहलुओं को लेकर जांच करती रही।
पुलिस ने उस स्टोर रूम का भी जायजा लिया, जहां अमित ने फांसी लगाई थी। एसपी सौम्या ने बताया कि मोबाइल से यह पता लगाया जा सकता है कि इसमें कौन कौन सा गेम डाउनलोड हुआ है। इसकी फोरेंसिक जांच होगी। उन्होंने कहा कि ब्लू व्हेल के अलावा कोई ओर जानलेवा गेम भी हो सकता है। पुलिस ने धारा 174 के तहत केस दर्ज कर छानबीन कर रही है।
कहीं अमित किसी और गेम का शिकार तो नहीं हो गया?
साढ़े 10 साल के अमित ने स्टोर रूम में अपने आप को फंदा लगाकर कैसे मौत को गले लगा लिया? मौकाए वारदात पर पहुंची पुलिस खुद सकते में थी कि पांचवीं के बच्चे ने कैसे साढ़े पांच फुट ऊंची छत पर फंदा बांधा और लटक गया? कहीं ऐसा तो नहीं कि ब्लू व्हेल गेम की आड़ में किसी और ने उसे अपना शिकार तो नहीं बना लिया? पुलिस देर से ही सही पर अब केस के हर पहलु को लेकर छानबीन में जुट गई है।
स्टोर रूम घर के परिसर में रसोई से करीब पन्द्रह मीटर की दूरी पर था। परिजनों ने पुलिस को बताया कि अमित रोज की तरह स्कूल से लौटा और पड़ोस में खेलने चला गया। जब अंधेरा होने तक वह नहीं लौटा तो उसके मां बाप उसे ढूंढने निकले। उन्होंने पड़ोसी जय प्रकाश से करीब साढ़े सात बजे फोन पर पूछा कि क्या अमित आपके घर में है ? तो उन्होंने बताया कि वह नहीं है। रात करीब आठ बजे उसकी मां ने स्टोर रूम चेक किया तो वहां अमित का शव लटका मिला।
पुलिस ने स्टोर रूम की भी छानबीन की। अमित ने अपने आप को जहां फंदा लगाया था, उस जगह की ऊंचाई करीब साढ़े पांच फुट है। रस्सा का एक सिरा ऊपर लकड़ी की बल्ली पर बांधा गया था, जो उतने छोटे बच्चे के लिए आसान नहीं था। फिर ये सिरा कैसे बांधा गया होगा ये भी खुद में एक सवाल है।
वहीं करीब में एक बाल्टी भी पड़ी थी, ऐसा अंदाजा लगाया जा रहा है कि उस बाल्टी पर चढ़ कर ही अमित ने फंदा लगाया होगा। ऐसा वहां मौजूद लोगों का कहना था। आमतौर पर रोजाना किसी न किसी कार्य को लेकर इस स्टोर में घर वालों का आना-जाना लगा रहता था। इस स्टोर में अगर कोई बिल्ली भी घुस जाये तो घर के लोग उसकी आहट से चौंक जाते थे। पर उस दिन अमित को देखने के लिए कोई भी स्टोर में काफी देर तक कोई नहीं आया।
फंदे में इस्तेमाल रस्सी परिजनों ने अमित की चिता में जलाई
अमित ने जिस रस्सी से फंदा लगाकर अपनी जान दी थी, उसे परिजनों ने मासूम की चिता के साथ जला दिया। चिता में रस्सी जलाए जाने से पुलिस की चिंता और बढ़ गई है। पुलिस को अमित का सुसाइड नोट तक नहीं मिला। सोमवार की देर रात को अस्पताल से लौटने के बाद अमित के कमरे परिजनों को सुसाइड नोट मिला था।
इस नोट को घर के ही किसी सदस्य ने सोशल मीडिया पर डाल दिया था। जिससे पूरे इलाके में यह खबर आग की तरह फैल गई। देर से जागी पुलिस गुरूवार को अमित के घर पहुंची और पूछताछ में पता चला किमरने के बाद वे उस व्यक्ति से जुड़ी हर वस्तु को चिता के साथ जला दिया जाता है।
सुसाइड नोट की मूल प्रति के बारे में भी परिजनों ने बताया कि वह कहीं खो गई है या जला दी गई है। पुलिस की टीम अगर मंगलवार को सुबह ही अमित के घर 174 के तहत कार्रवाई को पहुंचती तो शायद उसे रस्सी व सुसाइट नोट मिल जाता। जिन मिस्त्रियों का मोबाइल लेकर अमित गेम खेलता था, परिजनों ने उन्हें भी यह कह कर वापस भेज दिया था कि अब कई दिनों तक घर में काम नहीं होगा।
फोन न लैपटॉप फिर कौन फंसा रहा मासूम बच्चों को ब्लू व्हेल गेम में
ब्लू व्हेल की गेम खेलने के लिए स्मार्ट मोबाइल फोन, लैपटॉप और इंटरनेट की जरूरत होती है लेकिन हिमाचल के ठियोग और सोलन में सामने आए मामलों में यह दोनों ही इलेक्ट्रानिक गेजेट्स स्कूली बच्चों के पास नहीं थे। ऐसे में दोनों बच्चे गेम की चपेट में कैसे आए? इसकी जांच करना अब पुलिस के लिए बड़ी चुनौती बन गया है।
ठियोग में आत्महत्या करने वाला अमित चोरी से अपने पिता व अपने घर में काम कर रहे मिस्त्री फोन इस्तेमाल करता था। सोलन में साइबर कैफे में इंटरनेट के इस्तेमाल की बात कही गई है।
यह दोनों ही बातें ब्लू व्हेल गेम में फंसने के पुख्ता सुबूत नहीं हैं। लेकिन चौंकाने वाली बात ये है कि इन दोनों ही मामलों में ब्लू व्हेल के प्रचलित टॉस्क सामने आए हैं।
ब्लू व्हेल गेम के शिकार हुए बच्चों में अभी तक नस काटने, फांसी लगाने, बाजू में व्हेल की आकृति उकेरने जैसे टास्क सामने आए हैं। ठियोग में स्कूली बच्चे ने फांसी लगाकर जान दी है।
सुसाइड नोट में नस काटने के बदले अपने लिए फांसी की सजा तय की। आज पुलिस ने जांच में पाया कि अमित ने अंग्रेजी विषय की कॉपी में व्हेल की आकृति बनाई थी। उसने सुसाइड नोट में घर से प्यार नहीं मिलने की बात लिखी है। एक पहेली भी बनाई है।
नया गेम तो तैयार तो नहीं कर लिया
यह सारी चीजें ब्लू व्हेल गेम के विभिन्न टास्क हैं। जबकि सोलन के मामले में स्कूली बच्चे की बाजू पर व्हेल की आकृति बनी हुई थी। इन सब तथ्यों को देखकर तो स्पष्ट होता है कि हिमाचल में ब्लू व्हेल गेम ने बच्चों को अपनी चपेट में लेना शुरू किया है लेकिन, इन्हीं दोनों मामलों में बच्चों के पास अपने मोबाइल फोन और लैपटॉप नहीं पाए गए।
जबकि इस गेम को खलने के लिए बच्चों का नियमित इंटरनेट से जुड़े रहना जरूरी है। ऐसे में ये आशंका भी व्यक्त की जा रही है कि कहीं स्कूली बच्चों ने ब्लू व्हेल गेम की कहानियां सुन कर खुद ही इस तरह का कोई नया गेम तो तैयार तो नहीं कर लिया है। स्कूलों में बच्चे कहीं एक दूसरे को ऐसे खतरनाक टॉस्क तो नहीं दे रहे।
जिसमें उदास रहने वाले भावुक बच्चे फंस रहे हैं। ऐसे में मामले की तह तक पहुंचना पुलिस के लिए बड़ी चुनौती है। यह भी पता करना जरूरी है कि कहीं ये बच्चे इंटरनेट कैफे के नियमित सम्पर्क में तो नहीं थे? हैरत की बात है कि सोलन और शिमला पुलिस ने अब तक इस दिशा में काम शुरू नहीं किया।
तनाव से चैलेंज गेम्स के मकड़जाल में फंसते हैं बच्चे: डॉ. अनीता
हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय के मनोविज्ञान विभाग की विभागाध्यक्ष डॉ. अनीता शर्मा का कहना है कि पढ़ाई, अत्याधिक उम्मीदों और अकेलेपन के कारण ही स्कूली बच्चे इंटरनेट की इस तरह की चैलेंज गेम्स में फंसते हैं और बाहर नहीं निकल पाते।
यह भी एक नशे की लत की तरह से है जो एक से दूसरे से आगे बढ़कर पूरे ग्रुप में फैल जाता है। बच्चे देखा-देखी और जिज्ञासा के कारण इसके चक्रव्यूह में फंसते हैं।
अभिभावक उन पर ना नजर रख पाते और ना उन्हें समय देते है, जिसके चलते बच्चा भी अकेलेपन को दूर करने का इसे बेहतरीन विकल्प मान लेता है और मकड़जाल में फंस जाता है। बच्चे किताबों से अधिक फेसबुक और सोशल साइट्स पर ही अधिक व्यस्त रहने लगे है।
14 साल तक बच्चे हर नई चीज के लिए उत्सुक: डॉ. रवि
आईजीएमसी में मनोविज्ञान विभाग के चिकित्सक डॉ. रवि शर्मा का कहना है कि इस तरह की गेम्स में 8 से 14 साल की उम्र के बच्चे फंसते हैं। दरअसल इस उम्र में बच्चों की मानसिकता सबसे अलग होती है। वे हर नई चीज को लेकर उत्सुक होते हैं।
जिन चीजों में उन्हें मजा आए, वे मना करने के बावजूद उसकी ओर आकर्षित होते हैं। साथ ही अकेलेपन के चलते भी बच्चे इनकी ओर खींचे चले जाते हैं। इनके इस्तेमाल से धीरे-धीरे उनका व्यवहार बदलने लगता है।
इसमें अभिभावकों की भूमिका अहम होती है कि वे बच्चों को इलेक्ट्रानिक गैजेट का इस्तेमाल सिर्फ पढ़ाई के कामों के लिए करने को दें। उन पर चेक रखें कि कहीं बच्चा अकेले में जाकर तो गेम्स नहीं खेल रहा। व्यवहार पर ध्यान दें, साथ ही समय निकालकर बच्चों के साथ खेलें।