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गुरदासपुर उपचुनावः जनता ने भाजपा रणनीतिकारों को दिया सबक सीखने का मौका
संजय मिश्र/ अमर उजाला, नई दिल्ली
Updated Sun, 15 Oct 2017 09:57 PM IST
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गुरदासपुर लोकसभा उपचुनाव के परिणाम ने भाजपा को तगड़ा झटका दिया है। माना जा रहा है कि हिमाचल और गुजरात विधानसभा चुनाव के ऐन मौके पर आए इस परिणाम के जरिए जनता ने भाजपा रणनीतिकारों को सबक सीखने का मौका दिया है।
पीएम मोदी की लोकप्रियता बेशक अभी जस की तस बनी हुई है। लेकिन बीते कुछ महीनों से आ रहे जनता के रूझानों से स्पष्ट है कि भाजपा को जमीन की राजनीति पर जोर देना पडे़गा।
गुरदासपुर के अलावा केरल में विधानसभा उपचुनाव और इलाहाबाद विश्वविद्यालय में हुए छात्र संघ चुनाव के परिणाम सामने आए हैं। तीनों ही परिणामों में भाजपा को करारी मात झेलनी पड़ी है।
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पार्टी के नेता भी अब मान रहे हैं कि आने वाले समय में जिन राज्यों के चुनाव होने हैं उनमें हिमाचल प्रदेश की राह बेशक आसान है। मगर गुजरात में कड़ी चुनौती है।
यही वजह है कि भाजपा ने समूचे देश के संगठन की ताकत गुजरात चुनाव में झोंकने का निर्णय लिया है। दिपावली के बाद युवा मोर्चा और महिला मोर्चा समेत भाजपा संगठन के तमाम नेता एवं कार्यकर्ता गुजरात कूच करेंगे।
गुरदासपुर कैसे है भाजपा के लिए सबक
गुरदासपुर लोकसभा उपचुनाव परिणाम को भाजपा के लिए तगड़े झटके के रूप में देखा जा रहा है। पार्टी का यह गढ़ माना जाता रहा है। अभिनेता विनोद खन्ना लगातार तीन बार से इस सीट से चुनाव जीतते आ रहे थे।
उनकी मृत्यू के वजह से इस सीट पर उपचुनाव हुआ है। मगर परिणामों में यहां पार्टी को बड़ा झटका लगा है। कांग्रेस के सुनील जाखड़ ने 1,93,219 वोटों से जीत हासिल की है। ये वो जाखड़ हैं जोकि बीते 6 माह पहले हुए विधानसभा चुनाव में कांग्रेस की लहर के बावजूद हार गए थे।
गुरदासपुर के लिए ये बाहरी चेहरा भी कहे जा रहे थे। मगर परिणामों ने उनकी कमजोरियों को ढकते हुए भाजपा की कलई खोल दी है। भाजपा की हार के लिए वैसे तो कई वजहें हैं।
मगर जनता के बीच पार्टी का रंग उतरता दिख रहा है। किसी भी विधानसभा हलके में भाजपा की बढ़त नहीं है। आम आदमी पार्टी के उम्मीदवार लेफ्टिनेंट जनरल (सेवानिवृत्त) सुरेश खजूरिया तीसरे नंबर पर रहे हैं।
गुरदासपुर में भाजपा की करारी हार के वजह
गुरदासपुर उपचुनाव में भाजपा की करारी हार के रूप में जो प्रमुख वजहें हैं कि पार्टी ने विनोद खन्ना की पत्नि को उम्मीदवार नहीं बनाया था। मगर हार के अंतर को देखकर लगता है कि जनता ने यहां सीधे भाजपा को चोट दी है।
पंजाब संपन्न राज्यों में माना जाता है। उपचुनाव के परिणाम पर जीएसटी के असर को भी बड़ी वजह माना जा रहा है। कहा जा रहा है कि जीएसटी को लागू करने से आ रही दिक्कतों से व्यापारी वर्ग नाराज था। उपर से महंगाई भी आम आदमी की मुश्किलें बढ़ा रही हैं। तो दूसरी ओर पंजाब में कैप्टन अमरिंदर सिंह की सरकार बनने के बाद पहला चुनाव था इसलिए सरकार ने भी पूरी ताकत लगाई।
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पीएम मोदी की लोकप्रियता बेशक अभी जस की तस बनी हुई है। लेकिन बीते कुछ महीनों से आ रहे जनता के रूझानों से स्पष्ट है कि भाजपा को जमीन की राजनीति पर जोर देना पडे़गा।
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गुरदासपुर के अलावा केरल में विधानसभा उपचुनाव और इलाहाबाद विश्वविद्यालय में हुए छात्र संघ चुनाव के परिणाम सामने आए हैं। तीनों ही परिणामों में भाजपा को करारी मात झेलनी पड़ी है।
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पार्टी के नेता भी अब मान रहे हैं कि आने वाले समय में जिन राज्यों के चुनाव होने हैं उनमें हिमाचल प्रदेश की राह बेशक आसान है। मगर गुजरात में कड़ी चुनौती है।
यही वजह है कि भाजपा ने समूचे देश के संगठन की ताकत गुजरात चुनाव में झोंकने का निर्णय लिया है। दिपावली के बाद युवा मोर्चा और महिला मोर्चा समेत भाजपा संगठन के तमाम नेता एवं कार्यकर्ता गुजरात कूच करेंगे।
गुरदासपुर कैसे है भाजपा के लिए सबक
गुरदासपुर लोकसभा उपचुनाव परिणाम को भाजपा के लिए तगड़े झटके के रूप में देखा जा रहा है। पार्टी का यह गढ़ माना जाता रहा है। अभिनेता विनोद खन्ना लगातार तीन बार से इस सीट से चुनाव जीतते आ रहे थे।
उनकी मृत्यू के वजह से इस सीट पर उपचुनाव हुआ है। मगर परिणामों में यहां पार्टी को बड़ा झटका लगा है। कांग्रेस के सुनील जाखड़ ने 1,93,219 वोटों से जीत हासिल की है। ये वो जाखड़ हैं जोकि बीते 6 माह पहले हुए विधानसभा चुनाव में कांग्रेस की लहर के बावजूद हार गए थे।
गुरदासपुर के लिए ये बाहरी चेहरा भी कहे जा रहे थे। मगर परिणामों ने उनकी कमजोरियों को ढकते हुए भाजपा की कलई खोल दी है। भाजपा की हार के लिए वैसे तो कई वजहें हैं।
मगर जनता के बीच पार्टी का रंग उतरता दिख रहा है। किसी भी विधानसभा हलके में भाजपा की बढ़त नहीं है। आम आदमी पार्टी के उम्मीदवार लेफ्टिनेंट जनरल (सेवानिवृत्त) सुरेश खजूरिया तीसरे नंबर पर रहे हैं।
गुरदासपुर में भाजपा की करारी हार के वजह
गुरदासपुर उपचुनाव में भाजपा की करारी हार के रूप में जो प्रमुख वजहें हैं कि पार्टी ने विनोद खन्ना की पत्नि को उम्मीदवार नहीं बनाया था। मगर हार के अंतर को देखकर लगता है कि जनता ने यहां सीधे भाजपा को चोट दी है।
पंजाब संपन्न राज्यों में माना जाता है। उपचुनाव के परिणाम पर जीएसटी के असर को भी बड़ी वजह माना जा रहा है। कहा जा रहा है कि जीएसटी को लागू करने से आ रही दिक्कतों से व्यापारी वर्ग नाराज था। उपर से महंगाई भी आम आदमी की मुश्किलें बढ़ा रही हैं। तो दूसरी ओर पंजाब में कैप्टन अमरिंदर सिंह की सरकार बनने के बाद पहला चुनाव था इसलिए सरकार ने भी पूरी ताकत लगाई।
केरल में नहीं चला भाजपा का दांव
amit shah
केरल से भी भाजपा के लिए बुरी खबर है। यहां पार्टी की सेहत सुधारने के लिए पूरे भगवा परिवार ने अपनी ताकत झोंक रखी है। लेकिन उसका दांव यहां चलता नहीं दिख रहा है।
केरल के वेंगारा विधानसभा उपचुनाव के परिणाम ने भाजपा के सुनहरे दिनों को अभी दूर ही बताया है। वैचारिक रूप से भाजपा की धुर विरोधी इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग (आईयूएमएल) के उम्मीदवार केएनए खादर ने 23,000 से ज्यादा मतों के अंतर से वेंगारा उपचुनाव जीता है।
आईयूएमएल प्रमुख पीके कुन्हलिकुट्टी के अप्रैल में मल्लपुरम से लोकसभा सांसद चुने जाने के बाद यह सीट खाली हो गई थी। आईयूएमएल का कांग्रेस के साथ गठबंधन रहता है। इसलिए भाजपा के लिए यह परिणाम भी खतरे की घंटी है। पार्टी उम्मीदवार को करीब 5000 मतों से ही संतोष करना पड़ा है।
यूपी के इलाहाबाद से भी भाजपा के लिए बुरी खबर
यूपी के इलाहाबाद से भी भगवा परिवार के लिए राहत वाली खबर नहीं है। इलाहाबाद विश्वविद्यालय छात्र संघ चुनाव के आए परिणामों में संघ के छात्र संगठन एबीवीपी को केवल 1 सीट मिली है।
यहां समाजवादी पार्टी के छात्र संगठन समाजवादी छात्रसभा का सिक्का जमकर चला है। विवि के छात्र संघ के अध्यक्ष और उपाध्यक्ष पद पर समाजवादी छात्रसभा के उम्मीदवारों की जीत हुई है।
इलाहाबाद विश्वविद्यालय छात्रसंघ के चुनाव में समाजवादी पार्टी की छात्र इकाई समाजवादी छात्रसभा के अवनीश यादव ने अध्यक्ष पद पर और इसी संगठन के चंद्रशेखर चौधरी ने उपाध्यक्ष पद पर जीत हासिल की। तो भगवा परिवार के रूप में एकमात्र विजयी हुए उम्मीदवार की जीत महामंत्री पद पर हुई है।
एबीवीपी के निर्भय कुमार द्विवेदी ने महामंत्री के पद पर जीत दर्ज की है। घोषित परिणामों के अनुसार, अध्यक्ष बने यादव ने मृत्युंजय परमार को हराया जो किसी राजनीतिक दल के छात्र संगठन से नहीं जुड़े हुए हैं।
अध्यक्ष पद की एबीवीपी की प्रत्याशी प्रियंका तीसरे स्थान पर रहीं। इसी तरह उपाध्यक्ष पद के चुनाव में एबीवीपी के चितवंत कुमार तिवारी दूसरे स्थान पर रहे।
इलाहाबाद छात्रसंघ से पहले दिल्ली विश्वविद्यालय और जयपुर छात्र संघ चुनाव में भी चंद माह पहले ही भगवा छात्र संगठन की करारी हार हुई है। हर वर्ग से आ रहे संकेतों को भगवा परिवार को जल्द ही समझना पड़ेगा। वरना भाजपा के लिए आगे का दौर कांटो भरी राह बन सकती है।
केरल के वेंगारा विधानसभा उपचुनाव के परिणाम ने भाजपा के सुनहरे दिनों को अभी दूर ही बताया है। वैचारिक रूप से भाजपा की धुर विरोधी इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग (आईयूएमएल) के उम्मीदवार केएनए खादर ने 23,000 से ज्यादा मतों के अंतर से वेंगारा उपचुनाव जीता है।
आईयूएमएल प्रमुख पीके कुन्हलिकुट्टी के अप्रैल में मल्लपुरम से लोकसभा सांसद चुने जाने के बाद यह सीट खाली हो गई थी। आईयूएमएल का कांग्रेस के साथ गठबंधन रहता है। इसलिए भाजपा के लिए यह परिणाम भी खतरे की घंटी है। पार्टी उम्मीदवार को करीब 5000 मतों से ही संतोष करना पड़ा है।
यूपी के इलाहाबाद से भी भाजपा के लिए बुरी खबर
यूपी के इलाहाबाद से भी भगवा परिवार के लिए राहत वाली खबर नहीं है। इलाहाबाद विश्वविद्यालय छात्र संघ चुनाव के आए परिणामों में संघ के छात्र संगठन एबीवीपी को केवल 1 सीट मिली है।
यहां समाजवादी पार्टी के छात्र संगठन समाजवादी छात्रसभा का सिक्का जमकर चला है। विवि के छात्र संघ के अध्यक्ष और उपाध्यक्ष पद पर समाजवादी छात्रसभा के उम्मीदवारों की जीत हुई है।
इलाहाबाद विश्वविद्यालय छात्रसंघ के चुनाव में समाजवादी पार्टी की छात्र इकाई समाजवादी छात्रसभा के अवनीश यादव ने अध्यक्ष पद पर और इसी संगठन के चंद्रशेखर चौधरी ने उपाध्यक्ष पद पर जीत हासिल की। तो भगवा परिवार के रूप में एकमात्र विजयी हुए उम्मीदवार की जीत महामंत्री पद पर हुई है।
एबीवीपी के निर्भय कुमार द्विवेदी ने महामंत्री के पद पर जीत दर्ज की है। घोषित परिणामों के अनुसार, अध्यक्ष बने यादव ने मृत्युंजय परमार को हराया जो किसी राजनीतिक दल के छात्र संगठन से नहीं जुड़े हुए हैं।
अध्यक्ष पद की एबीवीपी की प्रत्याशी प्रियंका तीसरे स्थान पर रहीं। इसी तरह उपाध्यक्ष पद के चुनाव में एबीवीपी के चितवंत कुमार तिवारी दूसरे स्थान पर रहे।
इलाहाबाद छात्रसंघ से पहले दिल्ली विश्वविद्यालय और जयपुर छात्र संघ चुनाव में भी चंद माह पहले ही भगवा छात्र संगठन की करारी हार हुई है। हर वर्ग से आ रहे संकेतों को भगवा परिवार को जल्द ही समझना पड़ेगा। वरना भाजपा के लिए आगे का दौर कांटो भरी राह बन सकती है।