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धर्मवाद की डोर तोड़ रही ‘आजाद’ की सोच
Pratapgarh
Updated Mon, 05 Aug 2013 05:33 AM IST
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प्रतापगढ़। सावन और रमजान एकसाथ पड़ने पर कवि जुमई खां ‘आजाद’ का जिक्र जरूरी हो जाता है। एक साथ पड़े इन पर्वों की तरह आजाद ने भी हिंदू और मुसलमान संग समूचे समाज को अपनी रचनाओं से एकता की डोर में बांधने का प्रयास किया। आजाद ने धर्म और जातीयता की सोच को खारिज करते हुए अल्लाह की शान में लिखा तो भगवान राम, शिव व मां गंगा के सम्मान में भी कई अनमोल पंक्तियों का हार पिरोया। 5 अगस्त को इस महान कवि का जन्म दिन मनाया जा रहा है।
‘हम न हिंदू अही न मुसलमां अही, जाति मनई क आटै बहरुआ अही, देश सेवा इहै एक बाटे धरम, अपनी माई क हमहू दुलरुआ अही’ जैसी पंक्ति लिखने वाले कवि जुमई खां ‘आजाद’ का जन्म 5 अगस्त 1930 को संडवाचंद्रिका ब्लाक के गोबरी गांव में हुआ। पिता सिद्दीक अहमद ने उन्हें हमेशा हौसला दिया। मां हमीदा बानो ने संस्कारों की माला पहनाई। कवि आजाद ने 21 किताबें लिखीं। इनमें भगवान राम व शिव स्तुति वाली अवधी भाषा की ‘केवट’ नामक पुस्तक भी है। इस किताब में ‘स्तुति करी शंकर तोरी, विपदा सुना मोरि धाइके, कैलाश गिरि छोड़त्या तनी, डमरू बजउत्या आइके’ शिव स्तुति लिख कर अलग छाप बनाई। इसी किताब में भगवान राम पर आधारित उनकी कविता ‘मोरे पूत का राज अयोध्या पुरी, वन राम भखै बिरझाई गई, नर नारी सबै दरबारी कहैं, केकई क मतवा पगलाई गई’ लिख कर उन्होंने जातयीता और धार्मिकता पर भी प्रबार किया। पुस्तक ‘अधूरा स्वप्न’ में उन्होंने देश प्रेम का अनोखा चित्रण लिखा ‘भोर काशी की शामें अवध देखिए, ज्ञान, मंदिर, मदरसा मगध देखिए, है अजंता के दर्शित हमारा वतन, कितना प्यारा वतन कितना प्यारा वतन’ इस तरह की उनकी तमाम रचनाएं हिंदू व मुसलमां को एकता का पाठ पढ़ा रही हैं।
आवाज के इंतजार में खोती कवि आजाद की गीतों के दिन बहुरने की उम्मीद है। आजाद के छोटे पुत्र मुर्तजा ने कहा कि रविवार को गायक रवि त्रिपाठी का फोन आया था। उन्होंने बाबूजी के गीतों को आवाज देने की बात कही है। घर जल्द आने की बात भी कही है। कब आएंगे दिन निश्चित नहीं किया। यदि उनके गीतों को आवाज मिली तो यह जन्म दिन पर किसी तोहफे से कम न होगा।
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बीमारी से जूझ रहे कवि जुमई खां आजाद को कोई देखने तक नहीं गया। सपा के घोषित प्रत्याशी व पूर्व सांसद सीएन सिंह ने कहा कि वह सोमवार को जाएंगे। कांवड़ियों के मामले में चले जाने से वह रविवार को आजाद को देखने नहीं पहुंच सके।
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‘हम न हिंदू अही न मुसलमां अही, जाति मनई क आटै बहरुआ अही, देश सेवा इहै एक बाटे धरम, अपनी माई क हमहू दुलरुआ अही’ जैसी पंक्ति लिखने वाले कवि जुमई खां ‘आजाद’ का जन्म 5 अगस्त 1930 को संडवाचंद्रिका ब्लाक के गोबरी गांव में हुआ। पिता सिद्दीक अहमद ने उन्हें हमेशा हौसला दिया। मां हमीदा बानो ने संस्कारों की माला पहनाई। कवि आजाद ने 21 किताबें लिखीं। इनमें भगवान राम व शिव स्तुति वाली अवधी भाषा की ‘केवट’ नामक पुस्तक भी है। इस किताब में ‘स्तुति करी शंकर तोरी, विपदा सुना मोरि धाइके, कैलाश गिरि छोड़त्या तनी, डमरू बजउत्या आइके’ शिव स्तुति लिख कर अलग छाप बनाई। इसी किताब में भगवान राम पर आधारित उनकी कविता ‘मोरे पूत का राज अयोध्या पुरी, वन राम भखै बिरझाई गई, नर नारी सबै दरबारी कहैं, केकई क मतवा पगलाई गई’ लिख कर उन्होंने जातयीता और धार्मिकता पर भी प्रबार किया। पुस्तक ‘अधूरा स्वप्न’ में उन्होंने देश प्रेम का अनोखा चित्रण लिखा ‘भोर काशी की शामें अवध देखिए, ज्ञान, मंदिर, मदरसा मगध देखिए, है अजंता के दर्शित हमारा वतन, कितना प्यारा वतन कितना प्यारा वतन’ इस तरह की उनकी तमाम रचनाएं हिंदू व मुसलमां को एकता का पाठ पढ़ा रही हैं।
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आवाज के इंतजार में खोती कवि आजाद की गीतों के दिन बहुरने की उम्मीद है। आजाद के छोटे पुत्र मुर्तजा ने कहा कि रविवार को गायक रवि त्रिपाठी का फोन आया था। उन्होंने बाबूजी के गीतों को आवाज देने की बात कही है। घर जल्द आने की बात भी कही है। कब आएंगे दिन निश्चित नहीं किया। यदि उनके गीतों को आवाज मिली तो यह जन्म दिन पर किसी तोहफे से कम न होगा।
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बीमारी से जूझ रहे कवि जुमई खां आजाद को कोई देखने तक नहीं गया। सपा के घोषित प्रत्याशी व पूर्व सांसद सीएन सिंह ने कहा कि वह सोमवार को जाएंगे। कांवड़ियों के मामले में चले जाने से वह रविवार को आजाद को देखने नहीं पहुंच सके।