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आल्हा को दिया था शारदा मां ने अमर होने का वरदान

Thu, 18 Apr 2013 05:30 AM IST
Jalaun
Jalaun Updated Thu, 18 Apr 2013 05:30 AM IST
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बैरागढ़/उरई (जालौन)। जिले में पौराणिक स्थलों का अलग महत्व है। कभी दिल्ली, कन्नौज और महोबा की रियासतों के केंद्र रहे एट थाना क्षेत्र का बैरागढ़ अकोढ़ी में दिल्ली के शासक पृथ्वीराज चौहान और महोबा के आल्हा, ऊदल की आखिरी लड़ाई हुई थी। मान्यता है कि आल्हा को मां शारदा का आशीर्वाद प्राप्त था। लिहाजा पृथ्वीराज चौहान की सेना को पीछे हटना पड़ा। मां के आदेशानुसार आल्हा ने अपनी साग (हथियार) यहीं मंदिर पर चढ़ाकर नोक टेढ़ी कर दी थी। जिसे आज तक कोई साधा नहीं कर पाया है। मंदिर परिसर में ही तमाम ऐतिहासिक महत्व के अवशेष अभी भी आल्हा व पृथ्वीराज चौहान की जंग की गवाही देते हैं।
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एट से आठ किलोमीटर दूर मां शारदा में श्रद्धालुओं का तांता लगा था। साधक तंत्र साधना में लीन थे। पुजारी शारदा शरण ने मंदिर बताया कि उनके पूर्वज 1433 ईसवी से मंदिर की पूजा अर्चना करते आ रहे हैं। मां शारदा शक्ति पीठ का उल्लेख दुर्गा सप्तसती में भी है।
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आचार्य श्याम जी दुबे ने बताया कि मान्यता है कि पृथ्वी की मध्य धुरी बैरागढ़ में है। मां की मूर्ति की किसी ने स्थापना नहीं की है। यह जमीन अपने आप ही उदय हुई है। जब महोबा के राजा परमाल के ऊपर पृथ्वीराज चौहान की सेना ने हमला किया तो उनके वीर योद्धा आल्हा ने पृथ्वीराज चौहान से युद्ध के लिए बैरागढ़ में ही डेरा डाल रखा था। यहीं वह पूजा अर्चना करने आए तो मां ने साक्षात दर्शन देकर उन्हें युद्ध के लिए सांग दी। काफी खून खराबे के बाद पृथ्वीराज चौहान की सेना को पीछे हटना पड़ा। युद्ध से खिन्न होकर आल्हा ने मंदिर पर सांग चढ़ाकर उसकी नोक टेढ़ी कर वैराग्य धारण कर लिया। मान्यता है कि मां ने आल्हा को अमर होने का वरदान दिया था। लोगों की माने तो आज भी कपाट बंद होने के बावजूद कोई मूर्ति की पूजा कर जाता है। बहरहाल आस्था व शक्ति की प्रतीक मां शारदा के हर नवरात्रि पर लाखों लोग दर्शन कर मन्नतें मांगते हैं।
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इनसेट
मंदिर में बने कुंड में स्नान करने से मिट जाते हैं चर्म रोग
बैरागढ़/उरई (जालौन)। मां शारदा शक्ति पीठ के ठीक पीछे बने कुंड के बारे में मान्यता है कि इसमें एक बार स्नान करने से चर्म रोग ठीक हो जाते हैं। यह कुंड कभी खाली नहीं हुआ है और न ही कोई उसे खाली कर पाया है। मंदिर के पुजारी आचार्य श्यामजी दुबे ने बताया कि इस कुंड में अब तक न जाने कितने चर्मरोगी स्वास्थ्य लाभ ले चुके हैं। कई बार पंप से कुंड को खाली करवाने का प्रयास किया गया है लेकिन कभी भी कुंड खाली नहीं हुआ। आज तक कोई भी कुंड की गहराई नहीं नाप सका है।

इनसेट
पृथ्वीराज से भी वीर थे आल्हा ऊदल
उरई (जालौन)। पृथ्वीराज चौहान और आल्हा ऊदल के बीच 52 बार युद्ध हुआ और हर बार पृथ्वीराज की सेना को भारी क्षति हुई। बुंदेली इतिहास में आल्हा ऊदल का नाम बड़े ही आदर भाव से लिया जाता है। बुंदेली कवियों ने आल्हा का गीत भी बनाया है। जो सावन के महीने में बुंदेलखंड के हर गांव गली में गाया जाता है। जैसे पानी दार यहां का पानी आग, यहां के पानी में शौर्य गाथ के रूप से गाया जाता है। यही नहीं बड़े लड़ैया महोबे वाले खनक-खनक बाजी तलवार आज भी हर बुंदेलों की जुबान पर है। राजा परमाल की बेटी बेला का पृथ्वीराज की सेना ने अपहरण करने की धमकी दी थी। जिस पर कीरत सागर के मैदान में महोबा व दिल्ली की सेना के बीच युद्ध हुआ। इसमें पृथ्वीराज चौहान की पराजय हुई और आल्हा ऊदल की सुरक्षा में बेला ने सावन के बाद पड़ने वाले त्योहार भुजरियां सागर में विसर्जित की।
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