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शीला ने 'आप' पर क्यों डाले डोरे, तीन वजहें?
भरत शर्मा/टीम डिजिटल
Updated Fri, 29 Nov 2013 06:51 PM IST
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लगातार चौथी पारी खेलने की कोशिश में जुटी दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित ने सियासत का पुराना मंत्र जपते हुए कहा कि राजनीति में किसी से परहेज नहीं किया जा सकता।
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जाहिर है, भाजपा से उनका छत्तीस का आंकड़ा है, इसलिए इशारा आम आदमी पार्टी और अरविंद केजरीवाल की तरफ था। यह बात और है कि केजरीवाल ने तुरंत इस पर जवाब देते हुए यह प्रस्ताव सिरे से खारिज कर दिया।
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लेकिन सवाल उठना लाजिमी है कि हाल तक भाजपा और आप पर एक ताकत से हमला करने वाली शीला दीक्षित को वोटिंग की तारीख से कुछ दिन पहले यह बात याद क्यों आई और केजरीवाल के प्रति उनके रुख में नरमी क्यों दिख रही है।
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एक तबके का मानना है कि हालिया ओपिनियन पोल में कांग्रेस की घटती ताकत और भाजपा-आप के लगातार मजबूत होने की वजह से ऐसा हो सकता है। लेकिन तीन ऐसी चीजें हैं, जो शीला दीक्षित के इस नरम रुख के कारण तक पहुंचा सकती हैं।
कांग्रेस की कमजोरी और त्रिशंकु नतीजे की आशंका?
दिल्ली विधानसभा चुनावों से पहले आए तमाम ओपिनियम पोल अंदाजा दे रहे हैं कि विधानसभा चुनावों का सामना कर रहे पांचों राज्यों में सबसे दिलचस्प लड़ाई दिल्ली में देखने को मिल रही है।
साल भर पहले पैदा हुई केजरीवाल की आम आदमी पार्टी ने चुनावी समीकरण में भले बड़ा बदलाव न किया हो, लेकिन कांग्रेस और भाजपा को नए सिरे से सोचने पर मजबूर जरूर कर दिया है।
70 सीटों वाली विधानसभा में आप के नेता योगेंद्र यादव 33 और केजरीवाल 47 सीटों तक पहुंचने का दावा कर रहे हैं। भले यह हकीकत से दूर हो, लेकिन चुनाव पूर्व सर्वेक्षण पार्टी के दस सीटों तक पहुंचने की संभावना जता रहे हैं। जाहिर है त्रिकोणीय मुकाबले में 10 सीटें भी किंगमेकर की भूमिका में ला सकती हैं।
अगर भाजपा 35 के जादुई आंकड़े तक नहीं पहुंच सकी, तो शीला दीक्षित, आप के केजरीवाल से हाथ मिलाने के बारे में सोच सकती हैं और उनका हालिया बयान इसी ओर इशारा करता है।
शीला को आप से परहेज नहीं?
शीला दीक्षित ने जो बात कही, उसमें दम है। देश का सियासी इतिहास कई बार गवाही दे चुका है कि राजनीति में दुश्मन के दोस्त और दोस्त के दुश्मन बनने में ज्यादा वक्त नहीं लगता।
शीला दीक्षित और कांग्रेस लगातार तीसरी पारी खेल रहे हैं और विकास के मुद्दे पर चौथी दफा सीएम की कुर्सी तक पहुंचने का ख्वाब देखा जा रहा है। हाल तक सत्तारूढ़ दल कहता आ रहा था कि आप मुकाबले में नहीं है और उसका ध्यान भाजपा से जीतने पर है।
लेकिन यह साफ हो चला है कि केजरीवाल को पूरी तरह नजरअंदाज करना समझदारी नहीं होगा। जाहिर है, अगर कांग्रेस 35 सीटों तक नहीं पहुंचती और आप के खाते में कुछ सीटें आती हैं, तो कांग्रेस को सरकार बनाने के लिए केजरीवाल से ही हाथ मिलाना होगा।
भले अभी दोनों पक्ष गठजोड़ की संभावना से इनकार कर रहे हों, लेकिन चुनावी नतीजे आने के बाद बनने वाली समीकरण कब क्या करा दें, इस बारे में कुछ कहा नहीं जा सकता।
मतदाताओं को खींचने की कोशिश?
चुनावी मौसम में अगर शीला दीक्षित ने यह बात कही, तो इसके मायने भी खास होंगे। केजरीवाल भले यह प्रस्ताव ठुकरा चुके हैं और खुद दिल्ली कांग्रेस ने इस बारे में सफाई दी हो, लेकिन बयान का मतलब खास रहा होगा।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह बात मतदाताओं के बीच यह संदेश देने के लिए भी कही जाती है कि कोई पार्टी भले दूरी दिखा रही हो, लेकिन दोनों पक्षों के बीच इतना फासला है नहीं।
इस मामले में केजरीवाल खुद को पाक-साफ नेता के रूप में पेश कर रहे हैं और शीला की कोशिश यह है कि वह ज्यादा अलग न दिखें और वोटर के बीच यह मैसेज जाए कि नतीजों के बाद केजरीवाल जरूरत पड़ने पर कांग्रेस में भी मिल सकते हैं।
अगर शीला यह संदेश पहुंचाने में कामयाब रहती हैं, तो जाहिर है आप पर आंख मूंदकर भरोसा करने वाले मतदाता भी एक बार को कांग्रेस के बारे में सोचने पर मजबूर हो जाएंगे।
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