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AAP का क्या होगा जनाब-ए-आली?
भरत शर्मा/टीम डिजिटल
Updated Thu, 05 Dec 2013 01:20 AM IST
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दिल्ली का असल मतलब क्या है, यह किसी नेताजी से पूछ लीजिए। छुटभैये नेता से लेकर किसी बड़े राजनीतिक दल की पहली कतार के नेता तक। जवाब मिलेगा, दिल्ली का मतलब है सत्ता। हो भी क्यों न, आखिर देश यहीं से चलता है।
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लेकिन दिल्ली की अपनी राजनीति का मिजाज सीधा-सादा रहा। यहां का गुणा-भाग समझने में ज्यादा सिरदर्द कभी नहीं हुआ।
सियासी बिसात के मोहरे उंगलियों पर गिने जाते रहे और मुद्दे भी कमोबेश एक से रहे। वही महंगाई, भ्रष्टाचार, महिलाओं की सुरक्षा वगैरह, वगैरह।
और तो और, अब तक वोटिंग के दिन विकल्प भी दो रहे। एक हाथ का छापा, दूजा कमल का निशान। कुछेक सीटों पर बसपा या निर्दलीयों ने भी जोर दिखाया, लेकिन इतना दम किसी में नहीं रहा कि कुर्सी तक पहुंचने की ऊंचाई रखता हो।
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केजरीवाल ने पुरानी कहानी बदली
लेकिन इस बार कहानी बदली। उन्हीं पुराने मुद्दों में से एक भ्रष्टाचार को लाउडस्पीकर पर बार-बार बोलकर सबसे बड़ा मुद्दा बनाने वाला एक राजनीतिक दल कांग्रेस और भाजपा, दोनों के अरमानों पर झाड़ू फेरने का ख्वाब भी देख रहा है। बदलाव का झंडा उठाया अरविंद केजरीवाल ने और नींव पड़ी आम आदमी पार्टी की।
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ऐसा राजनीतिक दल, जिसका जन्म महाराष्ट्र के एक समाजसेवी के जन-आंदोलन की कोख से हुआ और एक ही साल में चुनाव लड़ने लायक स्थिति में भी पहुंच गया।
पार्टी के वरिष्ठ नेता और देश के जाने-माने सेफोलॉजिस्ट योगेंद्र यादव का कहना था कि यह पार्टी हार-जीत के लिए नहीं, बल्कि इसलिए चुनावी मैदान में उतर रही है, ताकि यह दिखा सके कि इस देश में 'स्वच्छ राजनीति' भी मुमकिन है।
अन्ना से नाता तोड़ राजनीति में उतरी
'आप' का कहना था कि जन लोकपाल आंदोलन के दौरान नेताओं का कहना था कि अगर उन्हें कानून बनवाना है, तो केजरीवाल को राजनीति में आना चाहिए। और अन्ना हजारे के बार-बार मना करने पर भी केजरीवाल ने राजनीतिक दल बना डाला।
आम आदमी पार्टी का कहना था कि वह अलग तरह की राजनीति करने आई है, लेकिन चुनाव करीब आते-आते दशा और दिशा, दोनों बदली। मंजिल सत्ता है, तो राह भी चुनावी राजनीति की पकड़नी पड़ी। चंदे को लेकर साफगोई बरतने के बावजूद केजरीवाल को भी सियासी हमले झेलने पड़े।
कथित तौर पर साफ-स्वच्छ छवि वाली इस पार्टी के उम्मीदवारों के दामन पर भी दाग लगे, AAP को 'अमीर आदमी पार्टी' कहा गया, स्टिंग ऑपरेशन के डंक ने भी कांटा। और तो और, आप के मंचों से विरोधी पार्टी के नेताओं को गाली देने और भद्दी भाषा के इस्तेमाल को लेकर बवाल भी खूब कटा।
केजरीवाल को खारिज करना भूल?
इन तमाम चीजों के बावजूद खुद कांग्रेस और भाजपा भी इस बात से इनकार नहीं कर सकती कि केजरीवाल ने दिल्ली की सियासत में अचानक तड़का सा लगा दिया।
यह बात और है कि ऑन-रिकॉर्ड दोनों दल आप को खारिज करते रहे। हाल तक सत्ता की जंग कांग्रेस-भाजपा के बीच होती थी, लेकिन इस बार मुकाबला लव ट्राएंगल की तरह दिलचस्प हो गया।
केजरीवाल ने चुनाव से काफी पहले ऐलान कर दिया था कि उनकी अगुवाई में आप दिल्ली में सरकार बनाएगी और रामलीला मैदान में 29 दिसंबर को जन लोकपाल बिल पारित किया जाएगा।
इस योजना से जहां उनका विश्वास झलका, वहीं विधानसभा और संसद जैसी लोकतांत्रिक संस्थाओं को लेकर उनकी अनास्था भी नजर आई। सोशल मीडिया से लेकर सड़क तक, आम आदमी पार्टी की मौजूदगी का अहसास पूरी दिल्ली को हुआ।
लेकिन खेल दिलचस्प है, ऐसे में नतीजे का अनुमान लगाना आसान नहीं। दरअसल, इस बात का आकलन मुश्किल है कि माहौल बनाने वाली यह पार्टी बदलाव की बयार से उसे वोटों में कितना बदल पाएगी।
आम आदमी पार्टी की चुनावी शुरुआत
बहुजन समाज पार्टी को जमीन पर पैदा कर आसमान तक पहुंचाने वाले कांशीराम याद आते हैं, जिनके पास अपना जनाधार था। जातीय समीकरण थे और मुद्दों की कोई कमी नहीं थी। लेकिन उन्हें भी सत्ता के करीब पहुंचने में पांच चुनाव लग गए।
उन्होंने खुद स्वीकार किया था कि वह चुनाव जीतने के लिए बल्कि दूसरों को हराने के लिए लड़ रहे हैं। क्या आम आदमी पार्टी की रणनीति भी यही है?
अपने ओपिनियन पोल में 47 सीटों का दावा करने वाले केजरीवाल भी जानते हैं कि सियासत की पिच पर बल्लेबाजी इतनी आसान नहीं।
तमाम आशंकाओं के बावजूद अगर मान लिया जाए कि आप अपने बूते सरकार बनाने लायक सीटें बटोर ले, तो यह किसी चमत्कार से कम नहीं होगा। हालांकि इसकी उम्मीद कम है।
त्रिशंकु नतीजों की सूरत में क्या करेंगे केजरीवाल?
अगर नतीजे त्रिशंकु आए और केजरीवाल ने अपने दावे के मुताबिक कांग्रेस और भाजपा, किसी से हाथ नहीं मिलाया, तो राष्ट्रपति शासन लगेगा। कमान रहेगी उप राज्यपाल के हाथों में।
यह हालात कांग्रेस के लिए फायदेमंद साबित हो सकते हैं, जो यह दावा करेगी कि अगर उसे सत्ता में नहीं लाया गया, इसलिए यह हश्र हुआ।
लेकिन अगर केजरीवाल ने हाथ मिलाया, तो उनका सिरदर्द बढ़ जाएगा। क्योंकि ऐसे हालात में उस पार्टी से हाथ मिलाना होगा, जिन्हें वो पिछले साल भर से कोस रहे थे।
शनिवार की रात यूं तो ज्यादातर नेताओं की नींद उड़ी रहेगी, लेकिन दिल्ली की सियासत में ऊंचा कद रखने वाली कांग्रेस और भाजपा के नेता खास तौर से जगे रहेंगे, क्योंकि अगर वो सोए, तो नींद में भी केजरीवाल आएंगे!