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चुनावी चौपाल पर ‘पाल' चिंतन
सूर्यकुमार पांडेय
Updated Wed, 02 Apr 2014 07:15 PM IST
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मैं दिल्ली के पालम हवाई अड्डे पर उतरा, तो नागपाल वहां मेरा इंतजार कर रहा था। मैं उसकी कार में बैठा। वह बोला, अगर तुम्हारे पास समय हो, तो हम यहीं जयपाल के यहां से होते हुए चलते हैं। बार-बार इधर आना नहीं हो पाता।
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जयपाल हमारा पुराना मित्र है। हम पहुंचे। भाभी ने चाय पिलाई। चाय पीते ही हमारे भीतर मोदी चाय की चौपाल उछाल मारने लग गई। मैंने कहा, यारो, इन दिनों तो चुनाव में मोदी की लहर चल रही है। इस पर जयपाल बोला, चुनाव में जब पीछे ‘नाव’ जुड़ी है, तो लहर की बातें तो होंगी ही। नागपाल कहने लगा, तभी तो चुनाव की नदी में खेवैया और पार लगैया की चर्चा भी आम है। जिसकी चल रही है, उस ‘हवा’ की भी बातें होती हैं।
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मैने कहा, पर यारो, नाव के ‘पाल’ की बात कोई नहीं करता। जयपाल और नागपाल मुस्कराए। मैं समझ गया। इन दोनों के नाम के पीछे भी पाल जुड़ा है। मैंने बात बदलते हुए कहा, मैं इस वाले नहीं, उस वाले पाल की बोल रहा हूं, जिसका मतलब होता है, पालाबदलू। यानी ये रहे, तो इनके पाले में। वे आए, तो उनके पाले में। इस पर नागपाल बोला, पाल वह है, जो किसी का पालतू नहीं होता। जयपाल ने भी हामी भरी।
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तब मैंने उनको बताया कि अब सुनो कि इस चुनाव में क्या हो रहा है? सर्वप्रथम बिहार में राजद को त्याग गए रामकृपाल। इसके बाद उत्तर प्रदेश में कांग्रेस को छोड़ गए जगदंबिका पाल। तत्पश्चात उत्तराखंड में खिसक लिए सतपाल महाराज। उधर मध्य प्रदेश में आडवाणी से छूट गया भोपाल। और तो और, दिल्ली में केजरीवाल को नहीं मिल पाया मनमाफिक जनलोकपाल।
मगर किसी को कुछ मिला भी? जयपाल ने पूछा।
मैंने कहा, हां, मिला क्यों नहीं? नमो को चाय चौपाल का आइडिया और शीला दीक्षित को राज्यपाल का पद।
नागपाल बोला, तुम्हारे इस अनुसंधान से मेरा कपाल घूमने लग गया है। अब बस भी करो।
मैंने कहा, अभी तो मुलायम के बालगोपाल, शिवपाल और रामगोपाल की कथा बाकी ही है। खैर, फिर कभी।