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और नहीं आएगा तार

नई सूचना प्रौद्योगिकी के विस्तार से जिस तरह समय और दूरी का फासला सिमटता गया है, उसमें भारत संचार निगम लिमिटेड (बीएसएनएल) का अपनी टेलीग्राम सेवा को बंद करने का फैसला अप्रत्याशित नहीं है।

इंटरनेट और मोबाइल फोन के युग में पैदा हुई पीढ़ी यह सुनकर हैरत में पड़ सकती है कि टेलीग्राम या बहुत प्रचलित रूप में तार का नाम लेते ही कभी लोगों के दिलों की धड़कन बढ़ जाती थी!

एक दौर था, जब तार लोगों को भावनात्मक रूप से जोड़े हुए था। दूसरे शहर नौकरी करने चले गए लड़कों को मां से, तो सीमा पर तैनात फौजियों को उनकी पत्नियों से। टेलीग्राम सुनते ही सब चौंक जाते थे। खबर अच्छी भी हो सकती थी और बुरी भी।

यह सेवा बहुत सस्ती नहीं थी, इसलिए 'थोड़ा लिखा है ज्यादा समझना' वाले अंदाज में संदेश भेजे जाते थे। मगर बदलते दौर में इसने दम तोड़ दिया, क्योंकि जब एसएमएस या ई-मेल से पल भर में कोई संदेश दुनिया के एक कोने से दूसरे कोने में पहुंच जाता है, तब भला तार के भरोसे कोई क्यों बैठा रहेगा!

बीएसएनएल का अपना आंकड़ा है कि आज मुश्किल से पांच हजार तार ही भेजे जाते हैं, उनमें भी अधिकांश सरकारी दफ्तरों या अदालती सम्मनों वगैरह से संबंधित होते हैं।

डॉट और डैश जैसे दो संकेतकों के जरिये संदेश भेजने वाला यह सफर अपने देश में 1850 के दशक में कोलकाता से शुरू हुआ था। तकरीबन 160 बरस पुरानी यह सेवा गुलामी के दिनों से लेकर आजाद भारत तक की न जाने कितनी घटनाओं की गवाह रही है।

इसकी कुछ बानगी विकिलीक्स के अमेरिका के पूर्व विदेश मंत्री हेनरी किसिंजर के दौर के डिप्लोमैटिक केबल के खुलासों में सामने आई थीं, जिसमें यहां से भेजे जाने वाले तारों में भारतीय राजनीति में मची उथल-पुथल की जानकारियां थीं।

वह आपातकाल का दौर था, जब सरकार के खिलाफ मुंह खोलने वालों के तबादलों की सूचना तक तार से भेजी जा रही थीं। बीएसएनएल की योजना इस सेवा को 15 जुलाई से बंद करने की है।

तकनीक की खूबी या खामी यही है कि वह अपने को लगातार नया करती है और पुराने को अनुपयोगी साबित करती है। सही भी है, बेतार पर सवार तकनीक के इस युग में तार का भला क्या काम!

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