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इतनी क्रूरता कहां से आती है!

cruelty against woman
घरेलू कामकाज करने वाली महिलाओं के साथ राजधानी में बरती गई क्रूरता का यह ताजा मामला सबसे सिहरा देने वाला है, तो सिर्फ इसलिए नहीं कि वह महिला मर चुकी है, बल्कि इसलिए भी कि इस घटना को एक सांसद के आवास में खुद उनकी पत्नी ने अंजाम दिया है।

क्या दुर्योग है कि पहले वसंत कुंज, फिर सरोजनी नगर, और अब चाणक्यपुरी में हिंसा का शिकार भी महिला रही है और हिंसा को अंजाम देने वाली भी महिला है। फर्क सिर्फ उनके सामाजिक स्तर का है। जुल्म ढाने वाली अगर पढ़ी-लिखी और संभ्रांत घरों की महिलाएं हैं, तो जुल्म सहने वाली सुदूर झारखंड, मणिपुर और पश्चिम बंगाल से आई मजबूर औरतें।

दिन भर काम करने के बाद भी उनके हिस्से में भूख, अनिद्रा, पिटाई और अपमान आता है। आतताइयों ने उत्पीड़न के नए तरीके ढूंढ लिए हैं। कामवालियों के बाल काट दिए जाते हैं। उन पर कुत्ते छोड़ दिए जाते हैं। मालकिनों की नृशंसता के किस्से बाहर न जाएं, इसके लिए कामवालियों को नग्न करके रखने से लेकर घरों में बंद कर देने के अनगिनत ब्योरे हैं।


विडंबना यह कि उनकी चीख अक्सर पड़ोसियों के कानों तक नहीं पहुंचती। इनकी तकलीफों का समाधान क्या इसलिए नहीं है कि वे बेजुबान हैं? चुनावों के समय भी इनके साथ बरती गई क्रूरता क्या इसलिए मुद्दा नहीं बन पाती कि इनका कोई वोट बैंक नहीं है! यह निश्चय ही थोड़ा संतोषजनक है कि इन तीनों ही मामलों में अपराध करने वालों की गिरफ्तारी हुई है।

लेकिन सत्ता के अहंकार में डूबे सामंती मानसिकता के लोग और अचानक उभरे नवधनाढ्य इससे कोई सबक सीखेंगे, ऐसा नहीं मान सकते। बेशक ऐसी हर क्रूरता के पीछे उन मालकिनों के व्यक्तिगत जीवन का तनाव भी जिम्मेदार है; इस लिहाज से यह समाजशास्त्रीय अध्ययन का विषय तो है ही, पर उससे भी ज्यादा गरीबी मिटा देने का दावा करने वाली सरकारों के लिए ठहरकर सोचने का अवसर है कि आज भी समाज में इतनी गैरबराबरी क्यों है कि पेट भरने के लिए नाबालिगों तक को ऐसे जुल्म सहने पड़ते हैं।

सिर्फ व्यवस्था का संवेदनशील होना ही काफी नहीं, जब तक हमारा समाज जिम्मेदार और जागरूक नहीं होगा, तब तक ऐसे मामलों पर पूर्णतः अंकुश नहीं लगेगा।

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