फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Columns ›   Opinion ›   Opposition may cut good days

अच्छे दिनों पर लग सकता है विपक्षी ग्रहण

Fri, 24 Apr 2015 08:40 PM IST
विनोद अग्निहोत्री
विनोद अग्निहोत्री Updated Fri, 24 Apr 2015 08:40 PM IST
विज्ञापन
Opposition may cut good days

पिछले वर्ष अप्रैल-मई महीने में जब लोकसभा चुनाव हो रहे थे, तब नरेंद्र मोदी की अगुआई में भाजपा का सूरज चढ़ रहा था और कांग्रेस समेत अन्य भाजपा विरोधी दल मोदी की सियासी आंधी से जूझने की विफल कोशिश में बिखरते जा रहे थे। लेकिन एक साल बाद देश की राजनीति में हवा का रुख अलग दिख रहा है। इस महीने में तीन बड़ी घटनाएं घटी हैं, जो भावी राजनीति में सरकार और विपक्षी सियासत की दिशा और दशा तय करेंगी।

विज्ञापन


पहली घटना राहुल गांधी की वापसी है। लोकसभा चुनाव के साथ ही बाद में हुए विधानसभा चुनावों में भी कांग्रेस बुरी तरह परास्त हुई। इन नतीजों ने पार्टी के भीतर और बाहर राहुल गांधी की नेतृत्व क्षमता पर उठते सवालों को और धार दे दी। रही-सही कसर संसद के बजट सत्र शुरू होते ही राहुल की लंबी छुट्टी ने पूरी कर दी। पार्टी के दिग्गजों ने सोनिया बनाम राहुल का विवाद खड़ा करके अपनी खेमेबंदी तेज करते हुए राहुल का रास्ता रोकने की व्यूह रचना शुरू कर दी। मगर पार्टी नेताओं की बयानबाजी की परवाह न करते हुए सोनिया गांधी ने किसान राजनीति की कमान अपने हाथों में लेकर दो निशाने साधे। एक तरफ सरकार के खिलाफ इस मोर्चे पर कांग्रेस को अन्य विपक्षी दलों से आगे खड़ा कर दिया, तो दूसरी तरफ चिंतन-मनन करके लौटे राहुल गांधी के लिए आगे की जमीन तैयार कर दी। फिलहाल दिल्ली की किसान रैली और उसके बाद लोकसभा में राहुल के भाषण से यही संकेत मिलता है कि कांग्रेस की यह रणनीति सफल हुई। इससे कांग्रेस के भीतर का घमासान भी शांत होगा और पार्टी सोनिया युग से राहुल युग में बिना बाधा के प्रवेश कर सकेगी।
विज्ञापन


अब बात जनता परिवार की। जब-जब किसान जातियों की राजनीति करने वाले दल और नेता एकजुट हुए हैं, उसका राजनीति पर असर पड़ा है। 1977 की एकता भले ही 1980 में टूट गई, पर जब 1989 में एकता हुई, तो केंद्र की सत्ता बदल गई। 1990-91 में यह एकता फिर टूटी, पर 1996 में वे एकजुट हुए, तो केंद्र में फिर सरकार बनी। इसलिए नई एकता का देश की सियासत पर असर पड़ना तय माना जा रहा है। इसका पहला असर बिहार विधानसभा चुनाव में दिख सकता है। वहां अगर भाजपा की गाड़ी फंसती है, तो वजह जनता परिवार के विलय से बनने वाली जातिगत सामाजिक गोलबंदी ही होगी।
विज्ञापन
विज्ञापन


तीसरी घटना माकपा महासचिव पद पर सीताराम येचुरी की ताजपोशी की है। 2009 से पहले तक वामपंथी राजनीति देश में गैर कांग्रेस-गैर भाजपा राजनीति की महत्वपूर्ण धुरी रही है। 1989 में केंद्र की सत्ता से कांग्रेस को बेदखल करके जनता दल के नेतृत्व में राष्ट्रीय मोर्चे और 1996 में संयुक्त मोर्चे की सरकारें वाम मोर्चे के कंधे पर ही बनीं। यूपीए-1 सरकार को भी वाम मोर्चे की बैसाखी ने ही सहारा दिया। लेकिन बाद में हरिकिशन सिंह सुरजीत के उत्तराधिकारी प्रकाश करात की वैचारिक और राजनीतिक हठधर्मिता ने वाम मोर्चे को हाशिये पर पहुंचा दिया। अपने अस्तित्व के लिए जूझ रहे वाम मोर्चे की धुरी माकपा में यह नेतृत्व परिवर्तन पार्टी के लिए संजीवनी बन सकता है। क्योंकि येचुरी न सिर्फ माकपा, बल्कि पूरे वाम मोर्चे और विपक्ष की राजनीति का लोकप्रिय चेहरा हैं। विपक्ष की राजनीति में येचुरी वही भूमिका निभा सकते हैं, जो अतीत में कॉमरेड हरिकिशन सिंह सुरजीत निभाते रहे हैं।


इस तरह इन तीनों राजनीतिक घटनाओं का, जो अलग-अलग दलों में घटी हैं, संयुक्त असर भाजपा और एनडीए के घटक दलों के लिए नई राजनीतिक चुनौती पैदा कर सकता है। दिल्ली चुनाव नतीजों से इस चुनौती की शुरुआत हो चुकी है।

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed