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जीएम फसलों का मिथक

Wed, 06 Mar 2013 09:41 PM IST
युद्धवीर सिंह
युद्धवीर सिंह Updated Wed, 06 Mar 2013 09:41 PM IST
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myth about gm crops

हाल ही में अपने एक भाषण में केंद्रीय कृषि मंत्री शरद पवार ने कहा, ‘हम बदलाव के जिन साधनों और तरीकों को तेजी से अपना रहे हैं, उन पर सावधानी से विचार किया जाए। कृषि की दीर्घकालिक स्थिरता भी उतनी ही महत्वपूर्ण है, जितनी खेती की लागत घटाना। इसके साथ ही आबादी के लिए सुरक्षित भोजन उपलब्ध करवाना भी हमारा लक्ष्य होना चाहिए।’

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पवार ने निश्चित रूप से सही बात कही है, लेकिन इसके साथ ही वह उसी समय उत्पादन में वृद्धि और खाद्य सुरक्षा के लिए आनुवंशिक रूप से संशोधित खाद्य पदार्थों की पैरवी करते रहे, जो न केवल विरोधाभासी लगता है, बल्कि बहुत हद तक बेतुका भी।
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‘खाद्य उत्पादन दोगुना’ करने के लिए आनुवांशिक रूप से संशोधित (जीएम) फसलों को बढ़ावा देने का यह नाटक बायोटेक बीज लॉबी के साथ सम्मेलनों जैसे हास्यास्पद स्तर तक पहुंच गया है। यह सब तब किया जा रहा है, जब कृषि पर गठित संसद की स्थायी समिति की सिफारिशों और सुप्रीम कोर्ट द्वारा बनाई गई तकनीकी विशेषज्ञ समिति की अंतरिम रिपोर्ट में कहा गया है कि इस तरह की प्रौद्योगिकी को अपनाने के मसले पर सरकार को अत्यंत सावधानी रखनी चाहिए। रिपोर्ट में इसकी जरूरत पर भी सवाल उठाए गए।  
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भारत में दुनिया का सबसे बड़ा अनाज भंडार है, लगभग 667 लाख टन का। यह बफर स्टॉक के लिए तय सरकारी सीमा की तुलना में ढाई गुना अधिक है। इतना होने के बाद भी अनाज भूखों तक नहीं पहुंच रहा है। क्या यह गलत नहीं है? फिर किस आधार पर कृषि मंत्री उन जीएम फसलों की जरूरत बता रहे हैं, जो दुनिया भर में विवाद में फंस गई हैं? इससे पहले वैज्ञानिक यह दावा खारिज कर चुके हैं कि जीएम फसलों से खाद्य सुरक्षा और उत्पादन के स्तर को बढ़ाया जा सकता है।

यह हमारे सामने उत्पादन और विज्ञान जैसे दो महत्वपूर्ण मुद्दों को लाता है। अगर हम उत्पादन की बात करें, तो हमारे पास हरित क्रांति के अनुभव हैं और भारत में पहली जीएम फसल बीटी कपास को एक दशक हो गया है। आज जीएम फसलों की पैरवी ठीक वैसे ही की जा रही है, जैसे हरित क्रांति को खाद्य सुरक्षा के लिए रामबाण के रूप में पेश किया गया था। लेकिन इसके परिणामों की कभी समीक्षा नहीं की गई। कृषि रसायनों यानी उर्वरकों और कीटनाशकों के बेतहाशा उपयोग ने प्राकृतिक पूंजी यानी धरती की उर्वरता को खत्म कर दिया है। यह खबर नहीं बनती कि देश के सबसे उपजाऊ भागों में भी कृषि उत्पादन तेजी से गिर रहा है। खबरों में उन हजारों किसानों और खेतिहर मजदूरों का उल्लेख भी नहीं होता, जो कथित क्रांति के खूबसूरत दावों के पीछे कैंसर जैसी महामारी भोग रहे हैं।

इसी तरह, जब 2002 में बीटी कपास प्रस्तुत किया गया था, तब इस बीज का विकास करने वाले बायोटेक बीज उद्योग और इसे प्रोत्साहित करने वाली सरकार ने ऊंचे दावे किए थे। एक दशक बाद, जमीनी अनुभव इन बीजों की विफलता की एक अलग ही कहानी बताते हैं। बीटी कपास की प्रस्तुति के बाद हमारे देश में कपास की उपज में कोई महत्वपूर्ण वृद्धि नहीं हुई है। 2004-05 में जब गैर बीटी कपास फसल का क्षेत्रफल 94.6 फीसदी था, तब कपास का औसत राष्ट्रीय उत्पादन 470 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर था और वर्ष 2011-12 में जब बीटी कपास का क्षेत्रफल कुल कपास की खेती का 93 प्रतिशत पर पहुंच गया, तब कपास का औसत राष्ट्रीय उत्पादन 481 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर हो गया। बीज की उपलब्धता और विविधता पर प्रभाव की तो बात ही अलग है। यह भी ध्यान देने वाला तथ्य है कि आज लगभग पूरे कपास बीज बाजार पर अमेरिकी बीज निर्माता कंपनी मोनसेंटो का नियंत्रण है।

देश भर के किसानों के साथ बातचीत में यह स्पष्ट हो गया है कि किसानों को भ्रामक विज्ञापनों के जाल में उलझाया गया है। वे चाहकर भी बीटी कपास को छोड़ नहीं सकते, क्योंकि गैर बीटी संकर बीज अब उपलब्ध नहीं हैं। गैर बीटी कपास के बीजों को षड्यंत्रपूर्वक व्यवस्थित रूप से बाजार से बाहर किया गया है, और जो बचा रह गया था, उसे बीटी जीन ने दूषित कर दिया है। 12वीं पंचवर्षीय योजना के प्रारूप में भी इस बात का उल्लेख किया गया है।

इस वास्तविकता को स्वीकार करने की जगह हमारा कृषि मंत्रालय केवल अपना फायदा देख रही एबीएलई और मोनसेंटो जैसी कंपनियों को प्रोत्साहित करता प्रतीत हो रहा है। और अंततः किसान आत्महत्या में भी, जो हमारी कृषि नीतियों का एक वास्तविक प्रतिबिंब है, कमी नहीं आ रही है। बल्कि बीटी कपास के तहत आने वाले क्षेत्रों में तो किसान आत्महत्याओं में वृद्धि ही हुई है।

यह सब मुझे इसके विज्ञान के करीब लाता है। किसानों को हमें एक तरह से कृषि का पहला वैज्ञानिक मानना चाहिए। स्कूलों से प्रमाणपत्र और डिग्री लेने वालों जैसा नहीं, जो जमीनी सच्चाइयों से कटे रहते हैं। ये वे वैज्ञानिक हैं, जो घरेलू जंगली प्रजातियों का परीक्षण और प्रयोग कर रहे हैं और सदियों से बीज और ज्ञान बांट रहे हैं। इसकी तुलना में आज उद्योग द्वारा प्रोत्साहित और सरकारों द्वारा तेजी से अपनाया जा रहा कृषि विज्ञान पूरी तरह विपरीत लगता है। दुर्भाग्य से यह कॉरपोरेट मुनाफे के एजेंडे से प्रेरित है।


कृषि मंत्रालय और भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद को किसानों के पक्ष में काम करना चाहिए, उनके खिलाफ नहीं। और अंत में, सबसे महत्वपूर्ण बात- हमारी नीतियां देश को भोजन देने वाले किसानों की आजीविका की रक्षा करने वाली होनी चाहिए।

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