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यूपीए सरकारः खामियां भी बड़ी, बोल भी बड़े

Wed, 22 May 2013 01:18 AM IST
नई दिल्ली/अमर उजाला नेटवर्क
नई दिल्ली/अमर उजाला नेटवर्क Updated Wed, 22 May 2013 01:18 AM IST
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upa government weakness and promises

यूपीए सरकार ने किसी तरह लड़खड़ाते हुए चार साल पूरे कर लिए हैं। इस दौरान घोटाले और कमजोर नीति के कारण कई बार सरकार को आलोचना का भी शिकार होना पड़ा। एक नजर सरकार की खामियों पर।

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सरकार की किरकिरी
कॉमनवेल्थ गेम्स में सुरेश कलमाडी, 2जी मामले में ए राजा और कनिमोझी, आदर्श सोसायटी घोटाले में महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री अशोक चव्हाण और इसके बाद हेलिकॉप्टर सौदा और कोयला घोटाला जैसे खुलासे सरकार की किरकिरी कराते रहे।
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पीएम पर भी आंच
कोयला घोटाले की आंच पीएमओ तक पहुंचने के कारण साफ-सुथरी और ईमानदार छवि वाले पीएम की साख पर सवाल खड़े हो गए। इसके बाद रेलवे, घूसखोरी और सीबीआई मामले में पीएम के नजदीकी माने जाने वाले पवन बंसल और अश्विनी कुमार का नाम सामने आना भी पीएम की छवि के लिए बुरा साबित हुआ।
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सहयोगियों ने छोड़ा साथ
2011 में रिपब्लिकन पार्टी ऑफ इंडिया ने यूपीए छोड़कर एनडीए से हाथ मिला लिया। 2012 में एफडीआई के मुद्दे पर ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस ने भी सरकार से समर्थन वापस ले लिया। स्थानीय मुद्दों को लेकर जेवीएम और एआईएमआईएम जैसी क्षेत्रीय पार्टियों ने भी यूपीए से किनारा कर लिया।

चुप्पी ने बढ़ाया आक्रोश
महंगाई, विदेश नीति, आर्थिक सुधार और काला धन जैसे मामलों में सरकार की चुप्पी, लोकपाल बिल को लेकर अन्ना हजारे सहित सिविल सोसायटी के देशव्यापी आंदोलन, बाबा रामदेव के आंदोलन के दौरान आधी रात को आंदोलनकारियों पर पुलिस बल का इस्तेमाल और दिल्ली में हुए गैंग रेप कांड से जनता में उभरे आक्रोश ने सरकार को कटघरे में खड़ा कर दिया।

महंगाई बढ़ती ही गई
यूपीए-2 के दौरान महंगाई की दर में सात फीसदी की बढ़ोत्तरी हुई। डीजल-पेट्रोल में डिकंट्रोल, कृषि उत्पादों की डिमांड और सप्लाई का अंतर और एलपीजी पर सब्सिडी वापस लेने जैसे फैसलों ने आम आदमी का बजट बिगाड़ दिया।


सबसे कम हुआ काम
यूपीए सरकार का दूसरा कार्यकाल और 15 वीं लोकसभा इसलिए भी याद की जाएगी, क्योंकि इस दौरान संसद में सबसे कम कामकाज हुआ।

विदेश नीति पर कमजोर
पाकिस्तान, चीन, श्रीलंका और मालदीव जैसे देशों के साथ भारत की कूटनीति कमजोर साबित हुई।

सिर्फ नाम आया सुधार का
भूमि अधिग्रहण, फूड सिक्योरिटी, जीएसटी, डीटीसी और आर्थिक सुधार से जुड़े कई बिल संसद की मंजूरी का इंतजार कर रहे हैं।

और गिरती गई साख
संसद की कार्यवाही लगातार ठप होना, अन्ना हजारे, बाबा रामदेव, अरविंद केजरीवाल जैसे सिविल सोसायटी के नुमाइंदों के सरकार और व्यवस्था के खिलाफ आंदोलन ने सरकार की साख को बड़ा नुकसान पहुंचाया।

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