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राजस्थान: फिर परिवर्तन की चर्चाएँ
Updated Sat, 02 Nov 2013 09:04 AM IST
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राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत एक साफ़ सुथरी छवि के मेहनती मुख्यमंत्री हैं इससे कोई इनकार नहीं करता।
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वर्ष 2008 से अब तक का उनका कार्यकाल भी वसुंधरा राजे सिंधिया के कार्यकाल की तुलना में अच्छा रहा यह बात भी राजनीतिक प्रेक्षक मानते हैं।
लेकिन फिर भी ये चर्चा इस समय आम है कि इस बार चुनाव में सत्ता परिवर्तन के आसार दिख रहे हैं।
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कांग्रेस में एक तरह की हताशा है और भाजपा के भीतर एक तरह का उत्साह। हालांकि कुछ लोग मानते हैं कि नतीजे उम्मीदों के उलट भी हो सकते हैं।
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अकेला पड़ा मुख्यमंत्री
अशोक गहलोत ने पिछले पाँच वर्षों में कई ऐसी योजनाएँ लागू कीं जो जनता के हित में थीं, जिसमें ग़रीबों से लेकर पशुओं तक के लिए मुफ़्त दवा और 40 लाख लोगों के लिए पेंशन का इंतज़ाम जैसा बहुत कुछ था।
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पिछले मुख्यमंत्री की तुलना में उनकी छवि भी एक ईमानदार मुख्यमंत्री की रही। लेकिन ये बात भी सही है कि वे अपने मंत्रियों और कर्मचारियों को अधिकार पूर्वक भ्रष्टाचार से रोक नहीं सके।
वे अपने कार्यकाल में गूजरों से टकराव को टालने में सफल रहे। लेकिन वे उनको लुभाने में विफल रहे। लोग कहते हैं कि बहुमत की कमी एक ऐसी वजह रही जिसकी वजह से अशोक गहलोत अपने पिछले कार्यकाल की तरह पूरे दमखम के साथ मैदान में उतर ही नहीं सके। फिर उनके मंत्रियों के कारनामों ने भी कसर नहीं छोड़ी।
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राजनीतिक टीकाकार मानते हैं कि अशोक गहलोत का कार्यकाल तो अच्छा रहा लेकिन उनकी पैरवी करने वाला कोई नहीं दिखता इसलिए वे सफल मुख्यमंत्री की तरह नहीं दिखते।
केंद्र में शक्तिशाली नेता के तौर पर स्थापित सीपी जोशी को गहलोत फूटी आँख नहीं भाते और ऊपर से जाट नेताओं को भी वे रास नहीं आ रहे हैं।
लेकिन दूसरी बार मुख्यमंत्री बने अशोक गहलोत जानते हैं कि इन विषम परिस्थितियों में अपनी नैया कैसे पार लगानी है, इसलिए वे खामोशी से लगे हुए हैं।
मुखर विपक्ष
अशोक गहलोत के विपरीत वसुंधरा राजे सिंधिया एक दबंग नेता की तरह देखी जाती हैं।
पिछले चुनाव में मिली हार के बाद पार्टी के कुछ नेताओं ने उन्हें दरकिनार करने की भरपूर कोशिश की थी लेकिन वे जिस अंदाज़ में लड़कर लौटीं उनसे रजवाड़ों से भरे राजस्थान की जनता को खुशी ही दी।
उनका पिछला कार्यकाल विवादों से भरा हुआ था।
उनके ही कार्यकाल में राजस्थान ने अपने इतिहास का सबसे गंभीर जातिगत तनाव देखा। गूजर सड़कों पर निकल आए और अपनी बिरादरी के लिए जनजाति का दर्जा मांगा। इस आंदोलन के दौरान एकाधिक बार जनजीवन पटरी से उतर गया।
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पुलिस और गूजर अंदोलनकारियों के बीच हुए संघर्ष में कोई 70 लोगों को जान से हाथ धोना पड़ा। इसमें कुछ पुलिस वाले भी थे। उन पर भ्रष्टाचार के आरोप लगे।
लेकिन सच यह भी है कि अशोक गहलोत सरकार पाँच साल में उनके खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं कर सकी।
वसुंधरा राजे ने इन पाँच सालों में बड़ा समय विदेश में बिताया और उनके नेतृत्व में विपक्ष कोई बड़ा आंदोलन भी खड़ा नहीं कर पाया।