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अब मृत्युदंड को समाप्त करने की बहस होगी तेज
नई दिल्ली/ब्यूरो
Updated Sat, 13 Apr 2013 01:11 AM IST
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मृत्युदंड को समाप्त न करने का स्पष्ट संदेश दे चुके भारत में आतंकी देविंदर पाल सिंह भुल्लर पर आया सुप्रीम कोर्ट का फैसला फांसी की सजा को खत्म किए जाने की बहस को तेज करेगा।
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मौत की सजा की तामील में देरी के आधार पर 18 आरोपियों ने अदालत का दरवाजा खटखटाया था, इनमें संसद पर हमला के दोषी आतंकी मोहम्मद अफजल गुरू की याचिका भी शामिल थी। भुल्लर पर फैसले के बाद 16 याचिकाएं अभी भी लंबित हैं। इनमें राजीव गांधी के हत्यारों की याचिका भी है।
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सर्वोच्च अदालत ने अपने फैसले में कहा है कि 1950 से लेकर 2009 तक 300 दया याचिकाएं राष्ट्रपति के समक्ष दायर हुई हैं। इनमें से 214 को राष्ट्रपति ने स्वीकार किया है और 69 को खारिज किया है। इनमें से 18 की ओर से दया याचिका के निपटारे में देरी को आधार बनाकर अदालत का दरवाजा खटखटाया गया है।
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मृत्युदंड को समाप्त किए जाने के मुद्दे पर विश्व भर में चल रही बहस का जिक्र किया है। अदालत ने कहा है कि इस बहस के दौरान 140 देशों ने मौत की सजा को खत्म भी कर दिया है लेकिन भारत में दो बार संसद में इस ओर किए गए प्रयास विफल रहे।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि मानव जीवन प्रकृति का अनमोल उपहार है। यही वजह है मौत की सजा समाप्त करने की बहस में कहा जाता है कि यदि तुम जीवन नहीं दे सकते तो उसे लेने का हक भी नहीं है। जबकि दूसरा पक्ष कहता है कि जघन्य मामलों में मौत की सजा दिया जाना गलत नहीं है।
20वीं सदी में यह बहस पूरे विश्व में जारी है। भारत में राष्ट्रपति या राज्यपाल सजा को माफ, कम और निलंबित कर सकते हैं। हमारे देश में मौत की सजा तभी दी जाती है, जब दोषी ने जघन्य अपराध किया हो। अदालत कानून के मुताबिक चलती है और हमारे देश में मौत की सजा देना कानून में है।
सर्वोच्च अदालत ने कहा है कि 1956 और 1961 में मृत्युदंड को समाप्त करने के पक्ष में विधेयक लाया गया था लेकिन वह एक बार लोकसभा और दूसरी बार राज्यसभा में अस्वीकार कर दिया गया। हालांकि विधि आयोग ने इसे जारी रखने की सिफारिश की थी। शीर्षस्थ अदालत ने भी कई मामलों में इस पर गहनता से विचार किया और बच्चन सिंह मामलों में इस सजा को दुर्लभतम मामलों तक सीमित कर दिया।