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आसान नहीं है भाजपा की ‘272 प्लस’ की डगर

Tue, 20 Aug 2013 07:51 AM IST
नई दिल्ली/हरीश लखेड़ा
नई दिल्ली/हरीश लखेड़ा Updated Tue, 20 Aug 2013 07:51 AM IST
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bjp mission 272 plus is not so easy

नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता के सहारे भाजपा ने लोकसभा चुनाव के लिए ‘मिशन 272 प्लस’ का ऐलान तो कर दिया है लेकिन इसकी कामयाबी की डगर बहुत आसान नहीं दिख रही है। इसकी एक बड़ी वजह भाजपा का हिंदी पट्टी तक सिमटा होना है।

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हिंदी हार्टलैंड में भी लोकसभा के लिए सबसे ज्यादा 80 सीटें देने उत्तर प्रदेश में भाजपा अभी तीसरे-चौथे स्थान पर है। सिर्फ नमो-नमो के सहारे पार्टी प्रदेश से 40 सीटें पाने की उम्मीद पाल रही है, लेकिन जमीनी हकीकत पार्टी भी जान रही है।
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बिहार में जदयू से अलग होने के बाद पार्टी पहले तो परेशान दिखी लेकिन अब पार्टी को यहां से अच्छे नतीजों की आस है। इसकी वजह यह है कि भाजपा के सरकार से अलग होने के बाद बिहार में ऐसी कई घटनाएं हुई हैं जिनसे मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की आलोचना शुरू हो गई है।
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पार्टी मानती है कि उत्तर प्रदेश और बिहार में चुनाव में जाति बड़ी भूमिका निभाती है। इसके लिए भाजपा मोदी को पिछड़े नेता के तौर पर भी प्रचारित करने जा रही है।

उत्तराखंड, दिल्ली, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, राजस्थान, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, झारखंड जैसे हिंदीभाषी राज्यों के साथ ही पंजाब, कर्नाटक, महाराष्ट्र, ओडिशा, असम आदि को भी शामिल कर दें तो भी इस राज्यों में लोकसभा की 543 सीटों में से 350 से कम सीटें हैं।

पूर्वोत्तर में भाजपा को असम, अरुणाचल प्रदेश, मणिपुर आदि में कुछ उम्मीदें हैं लेकिन तमिलनाडु, केरल व पश्चिम बंगाल से भाजपा को ज्यादा उम्मीद नहीं है।

जयललिता और मोदी की दोस्ती के चलते तमिलनाडु में भाजपा को अन्नाद्रमुक से गठबंधन की उम्मीद है, जबकि कर्नाटक में भी येदियुरप्पा की मदद से पुराना आंकड़ा पाने की आस है। येदियुरप्पा से भी मोदी की दोस्ती है।


हिंदीभाषी क्षेत्रों की सीटें कांग्रेस, सपा, बसपा, आरजेडी, एलजेपी, आरएलडी, आईएनएलडी जैसे दलों में भी बंटेंगी। हालांकि पार्टी उपाध्यक्ष मुख्तार अब्बास नकवी कहते हैं कि लोग केंद्र में बदलाव चाहते हैं और उनके सामने भाजपा ही एकमात्र विकल्प है।

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