132 साल पहले अदालत पहुंचा मंदिर विवाद, नौ बार हो चुकी सुलह की कोशिश
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रामजन्मभूमि/बाबरी मस्जिद मामले में सुलह की कोशिशें तो कई बार हो चुकी हैं, पर बातचीत किसी भी नतीजे पर नहीं पहुंच सकी। अतीत में जाएं तो वर्ष 1885 में पहली बार यह मामला अदालत में पहुंचा। तब से 132 साल हो चुके हैं।
अगर बात लगातार अदालती प्रक्रिया की करें तो भी तकरीबन 67 साल हो चुके हैं। इस दौरान कई बार सुलह-समझौते से विवाद को हल करने की पहल हुई। कभी सरकार आगे आई तो कभी किसी और ने यह प्रयत्न किया।
वर्ष 1985 से अब तक लगभग नौ बार ऐसे प्रयास हुए, लेकिन हर बार कोई न कोई बाधा इस राह में खड़ी हो जाती है। कभी कोई पक्ष ऐन मौके पर कन्नी काट गया तो कभी किसी संगठन ने इन कोशिशों में लंगड़ी मार दी। अब देखने वाली बात यही है कि सर्वोच्च न्यायालय के सुझाव पर पक्षकारों का इस बार क्या रुख होता है।
साल-दर-साल बातचीत... हर बार नतीजा सिफर
1990-91 में चंद्रशेखर जब प्रधानमंत्री थे, तब उन्होंने इस दिशा में काफी गंभीरता से प्रयास किया। उन्होंने प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव, महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री शरद पवार और राजस्थान के मुख्यमंत्री भैरोसिंह शेखावत की मध्यस्थता में बात कराई।
प्रस्ताव किया गया कि विवादित ढांचा को यूं ही छोड़ दिया जाए और उसके बगल में मंदिर का निर्माण हो जाए। एक वक्त तो ऐसा लगा कि वे इस विवाद के हल के करीब भी पहुंच गए, पर उनकी सरकार ही चली गई।
सहाय कमेटी ने सुझाए थे तीन हल... पर ढांचा ही गिर गया
दूसरा जो विवादित ढांचा है, वहां अब लंबे समय से पूजा-पाठ हो रहा है। मुसलमान उसे राम-रहीम का स्थल मान लें और इसे एक आध्यात्मिक केंद्र के रूप में विकसित कर दिया जाए। तीसरा यह कि परस्पर सहमति का कोई अन्य फॉर्मूला खोजा जाए।
पर, बात नहीं बन पाई और ढांचा गिरा दिया गया। ढांचा गिरने के बाद भी तत्कालीन नरसिंह राव सरकार ने कोशिशें जारी रखी। विवादित स्थल का अधिग्रहण कर लिया और शृंगेरी के शंकराचार्य स्वामी भारती तीर्थ को राजी कर एक ट्रस्ट बनवाकर उसमें सभी शकराचार्यों को शामिल कर इस विवाद का हल निकालने की कोशिश हुई। पर, पक्षकार एकमत नहीं हो पाए।
अटल और मनमोहन ने भी कोशिश
-अटल विहारी वाजपेयी की सरकार में प्रधानमंत्री कार्यालय में अयोध्या प्रकोष्ठ बनाया गया। वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी शत्रुघ्न सिंह को तैनात करके कई बार सुलह का प्रयास कराया गया। पर, हल नहीं निकला। मनमोहन सिंह सरकार में भी कैबिनेट सचिवालय में शत्रुघ्न सिंह की वापसी कराकर इस दिशा में फिर प्रयास किए गए लेकिन पक्षकारों को राजी नहीं किया जा सका।
शंकराचार्य-नदवी भी कर चुके हैं प्रयास
इस विवाद का हल निकालने का एक प्रयास ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के चेयरमैन राबे हसन नदवी और कांची कामकोटि के शंकराचार्य के बीच बातचीत से भी की गई। पर, मामला नहीं बन पाया।
कोशिशें यह भी
सितंबर 2010 में एक याचिका दायर कर अदालत से बाहर सुलह की संभावना तलाशने का आग्रह किया। एक पक्ष ने इस याचिका का विरोध किया, लेकिन इस मामले में फैसला करने वाली हाईकोर्ट की लखनऊ खंडपीठ के तत्कालीन न्यायाधीश न्यायमूर्ति धर्मवीर शर्मा ने कहा कि सुलह के लिए प्रयास करने में कोई हर्ज नहीं है। पर, बातचीत का सुझाव आगे नहीं बढ़ सका।
हाशिम-ज्ञानदास ने भी खूब कोशिश की
2012 में पक्षकार हाशिम अंसारी से बातचीत करके हनुमान गढ़ी के महंत ज्ञानदास ने भी इस सिलसिले में प्रयास किया और कई बार हिंदू व मुस्लिम प्रतिनिधियों से संपर्क कर इस विवाद का समाधान तलाशने की कोशिश की। पर, बात नहीं बनी। मुसलमानों और हिंदुओं दोनों की तरफ के कुछ संगठनों ने इस तरह की कोशिशों को खारिज कर दिया।
2010 से सुलह-समझौते की कोशिश कर रहे बसु
वे लगातार कहते रहे हैं कि श्रीराम जन्मभूमि का यह पूरा मामला जिस प्रकृति का है, उस प्रकृति के मामलों का हल सीपीसी की धारा 89 के तहत आपसी सुलह-समझौते से निकाला जा सकता है।
इसके लिए उन्होंने हिंदू-मुस्लिम सुलह-समझौता समिति भी बना रखी है। कहते हैं, ‘हम तो हमेशा चाहते हैं एक रास्ता निकल आए। इसके लिए हमने 2010 से लेकर 13 नवंबर 2016 तक हिंदू और मुसलमान के बीच सुलह समझौते की दर्जनों बैठकें कराई।
दोनों पक्षों से 10 हजार 502 पत्रक भी हस्ताक्षर कराए गए। यह पत्रक फैजाबाद के कमिश्नर को सौंप दिए गए हैं। सुप्रीम कोर्ट इन पत्रकों को संज्ञान में ले सकती है।