{"_id":"5978bc7c4f1c1bb8768b45a1","slug":"what-the-next-india-china-war-might-look-like","type":"feature-story","status":"publish","title_hn":"डोकलाम तनाव पर चीन से युद्ध नहीं बल्कि सुरक्षात्मक तैयारी को दे रहे हैं धार","category":{"title":"India News","title_hn":"भारत","slug":"india-news"}}
डोकलाम तनाव पर चीन से युद्ध नहीं बल्कि सुरक्षात्मक तैयारी को दे रहे हैं धार
amarujala.com- Written by: शशिधर पाठक
Updated Wed, 26 Jul 2017 09:55 PM IST
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indian army
भारत चीन की किसी धमकी को हल्के में नहीं ले रहा है। साऊथ ब्लाक सूत्रों के अनुसार नई दिल्ली डोकलाम तनाव के बीच बीजिंग से युद्ध नहीं चाहती, लेकिन तनाव बढऩे की दशा में हर चुनौती से निबटने की तैयारी से कोई समझौता नहीं किया जा सकता।
इसलिए सुरक्षा बल स्थानीय स्तर से लेकर उपग्रह और अन्य साधनों से लगातार पड़ोसी देश के सैनिकों के गतिविधियों की निगरानी कर रहे हैं। इस बीच एयरचीफ मार्शल बीएस धनोवा ने कहा कि दो मोर्चों पर साथ लडऩे के लिए जितनी ताकत होनी है वह नहीं है, लेकिन वायुसेना युद्ध के लिए पूरी तरह से तैयार हैं।
फिलहाल डोकलाम में तनाव भरे वातावरण के बीच साऊथ ब्लाक सूत्रों का कहना है कि भारत चीन के साथ युद्ध नहीं चाहता। लेकिन किसी हमले की दशा में हर चुनौती से निबटने के लिए सुरक्षात्मक तैयारी की जा रही है। चीन 16 जून के बाद से लगातार भारत को युद्ध की चेतावनी दे रहा है। रक्षा मंत्रालय के सूत्रों का कहना है कि भारत चीन की चेतावनी को नजरअंदाज नहीं कर रहा है। 1962 के युद्ध के बाद ऐसा पहली बार है जब चीन और भारत की सेना के बीच इतना लंबा तथा चेतावनी तनाव जारी है।
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हालांकि 1967 में नाथुला दर्रे को लेकर स्थानीय स्तर पर झड़प हुई थी, लेकिन वह बहुत ही संक्षिप्त थी। सूत्र का कहना है कि तनाव की स्थिति को देखते हुए भारत ने चुपचाप किसी हमले की दशा में आत्मरक्षा में सुरक्षा तैयारियों को तेज कर दिया है।
क्या है तैयारी
भारत ने चीन से लगती सीमा पर बारुदी सुरंगे बिछा रखी हैं। इसके अलावा तोप आदि की तैनाती को भी सुनिश्चित किया जा रहा है। गोला-बारुद की आपूर्ति आदि को धार देने की कोशिश हो रही है। किसी संक्षिप्त झड़प की स्थिति में न्यूनतम नुकसान की रणनीति बनाकर भारतीय सेना तैयारी कर रही है। ताकि स्थानीय स्तर की झड़प किसी भी दशा में युद्ध का रूप न लेने पाए। इसके साथ-साथ कूटनीतिक समाधान के तरीकों को तेज कर दिया है।
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इसलिए सुरक्षा बल स्थानीय स्तर से लेकर उपग्रह और अन्य साधनों से लगातार पड़ोसी देश के सैनिकों के गतिविधियों की निगरानी कर रहे हैं। इस बीच एयरचीफ मार्शल बीएस धनोवा ने कहा कि दो मोर्चों पर साथ लडऩे के लिए जितनी ताकत होनी है वह नहीं है, लेकिन वायुसेना युद्ध के लिए पूरी तरह से तैयार हैं।
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फिलहाल डोकलाम में तनाव भरे वातावरण के बीच साऊथ ब्लाक सूत्रों का कहना है कि भारत चीन के साथ युद्ध नहीं चाहता। लेकिन किसी हमले की दशा में हर चुनौती से निबटने के लिए सुरक्षात्मक तैयारी की जा रही है। चीन 16 जून के बाद से लगातार भारत को युद्ध की चेतावनी दे रहा है। रक्षा मंत्रालय के सूत्रों का कहना है कि भारत चीन की चेतावनी को नजरअंदाज नहीं कर रहा है। 1962 के युद्ध के बाद ऐसा पहली बार है जब चीन और भारत की सेना के बीच इतना लंबा तथा चेतावनी तनाव जारी है।
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हालांकि 1967 में नाथुला दर्रे को लेकर स्थानीय स्तर पर झड़प हुई थी, लेकिन वह बहुत ही संक्षिप्त थी। सूत्र का कहना है कि तनाव की स्थिति को देखते हुए भारत ने चुपचाप किसी हमले की दशा में आत्मरक्षा में सुरक्षा तैयारियों को तेज कर दिया है।
क्या है तैयारी
भारत ने चीन से लगती सीमा पर बारुदी सुरंगे बिछा रखी हैं। इसके अलावा तोप आदि की तैनाती को भी सुनिश्चित किया जा रहा है। गोला-बारुद की आपूर्ति आदि को धार देने की कोशिश हो रही है। किसी संक्षिप्त झड़प की स्थिति में न्यूनतम नुकसान की रणनीति बनाकर भारतीय सेना तैयारी कर रही है। ताकि स्थानीय स्तर की झड़प किसी भी दशा में युद्ध का रूप न लेने पाए। इसके साथ-साथ कूटनीतिक समाधान के तरीकों को तेज कर दिया है।
pm modi meet Xi Jinping
चीन को कम नहीं आंकते
भारतीय सैन्य अधिकारियों का कहना है कि चीन को हम मुकाबले में कम नहीं आंकते। सेना के पूर्व मेजर जनरल अशोक मेहता का कहना है कि चीन की सैन्य क्षमता क्षमता भारत से कहीं ज्यादा है, लेकिन इसके बाद भी सबकुछ चीन के पक्ष में नहीं है। मेहता कहते हैं कि चीन के पास युद्ध का अनुभव सीमित है।
जबकि भारतीय सेना देश के आजाद होने के बाद से कई युद्ध लड़ चुकी है। भारतीय सेना के अफसर युद्ध की रणनीति बनाने में माहिर माने जाते हैं। हमारे जवानों के पास भी आतंकवाद प्रभावित क्षेत्रों में लडऩे का अच्छा खासा अनुभव है। मेजर जनरल मेहता का माननना है कि भारत किसी भी एक फ्रंट पर चुनौती का सामना कर सकता है, लेकिन यदि चीन और पाकिस्तान के दोनों फ्रंट पर जूझना हो तो मुश्किल होगी।
नजर डोभाल की यात्रा पर
राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल ब्रिक्स देशों के एनएसए की बैठक में हिस्सा लेने जा रहे हैं। माना जा रहा है कि 27 जुलाई को उनकी राष्ट्रपति शी जिनपिंग से मुलाकात होगी। वह अपने समकक्ष यांग जेइची से चर्चा करेंगे। यांग जेइची और अजीत डोभाल अपने राष्ट्राध्यक्ष की तरफ से भारत-चीन सीमा विवाद पर भी अपने-अपने देश का प्रतिनिधित्व करने के लिए अधिकृत हैं।
ऐसे में माना जा रहा है कि 27-28 जुलाई की अजीत डोभाल की प्रस्तावित यात्रा के बाद डोकलाम विवाद का कोई समाधान निकल आएगा। ऐसे संकेत हैं एनएसए की चीन यात्रा के अच्छे नतीजे के लिए चीन और भारत दोनों तरफ से प्रयास जारी है।
भारतीय सैन्य अधिकारियों का कहना है कि चीन को हम मुकाबले में कम नहीं आंकते। सेना के पूर्व मेजर जनरल अशोक मेहता का कहना है कि चीन की सैन्य क्षमता क्षमता भारत से कहीं ज्यादा है, लेकिन इसके बाद भी सबकुछ चीन के पक्ष में नहीं है। मेहता कहते हैं कि चीन के पास युद्ध का अनुभव सीमित है।
जबकि भारतीय सेना देश के आजाद होने के बाद से कई युद्ध लड़ चुकी है। भारतीय सेना के अफसर युद्ध की रणनीति बनाने में माहिर माने जाते हैं। हमारे जवानों के पास भी आतंकवाद प्रभावित क्षेत्रों में लडऩे का अच्छा खासा अनुभव है। मेजर जनरल मेहता का माननना है कि भारत किसी भी एक फ्रंट पर चुनौती का सामना कर सकता है, लेकिन यदि चीन और पाकिस्तान के दोनों फ्रंट पर जूझना हो तो मुश्किल होगी।
नजर डोभाल की यात्रा पर
राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल ब्रिक्स देशों के एनएसए की बैठक में हिस्सा लेने जा रहे हैं। माना जा रहा है कि 27 जुलाई को उनकी राष्ट्रपति शी जिनपिंग से मुलाकात होगी। वह अपने समकक्ष यांग जेइची से चर्चा करेंगे। यांग जेइची और अजीत डोभाल अपने राष्ट्राध्यक्ष की तरफ से भारत-चीन सीमा विवाद पर भी अपने-अपने देश का प्रतिनिधित्व करने के लिए अधिकृत हैं।
ऐसे में माना जा रहा है कि 27-28 जुलाई की अजीत डोभाल की प्रस्तावित यात्रा के बाद डोकलाम विवाद का कोई समाधान निकल आएगा। ऐसे संकेत हैं एनएसए की चीन यात्रा के अच्छे नतीजे के लिए चीन और भारत दोनों तरफ से प्रयास जारी है।
indian army
क्या है भारत का मजबूत पक्ष
डोकलाम में भारत भूटान को सुरक्षा की गारंटी देने के कारण है। भारत का कहना है कि चीन अपने ताकत की धौंस देकर भूटान को दबा रहा है। डोकलाम का यह क्षेत्र भूटान का है। भूटान और चीन इस विवादित क्षेत्र पर समस्या के निबटारे के लिए बातचीत कर रहे थे और अचानक चीन ने इस पर अधिकार जमाना चाहा है।
विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने संसद में भी साफ किया है कि इस क्षेत्र से भारत की सुरक्षा संबंधी चिंताएं जुड़ी हैं। इसलिए अनदेखी नहीं की जा सकती है। कुल मिलाकर भारत नैतिक पक्ष को मजबूती से रखते हुए डोकलाम में अपने रुख पर कायम है।
चीन का पक्ष
चीन जोर देकर कह रहा है कि डोकलाम से भारत का कोई लेना-देना नहीं है। यह क्षेत्र उसका नहीं है। ऐसे में डोकलाम में भारत की सेना की मौजूदगी अंतरराष्ट्रीय मानदंड का उल्लंघन है। अत: भारत तत्काल अपनी सेना पीछे हटाए और इसके बाद बातचीत होगी। भारत को चीन की पहले सेना हटाने की जिद मान लेने में कोई ऐतराज नहीं है, लेकिन यह तभी संभव है कि जब भारतीय सेना के हटने के बाद चीन अपनी सेना को पीछे ले जाने की गारंटी दे दे।
भारतीय कूटनीतिज्ञों का कहना है कि डोकलाम में भारतीय सेना भूटान के आग्रह और उसे दी गई सुरक्षा गारंटी के आधार पर है। यदि भूटान नहीं चाहेगा तो हमारी सेना वहां कैसे रह सकेगी। ऐसे में भारत और चीन के बीच बढऩे वाला तनाव का माहौल भूटान के लोगों के लिए भी चिंता का विषय है।
डोकलाम में भारत भूटान को सुरक्षा की गारंटी देने के कारण है। भारत का कहना है कि चीन अपने ताकत की धौंस देकर भूटान को दबा रहा है। डोकलाम का यह क्षेत्र भूटान का है। भूटान और चीन इस विवादित क्षेत्र पर समस्या के निबटारे के लिए बातचीत कर रहे थे और अचानक चीन ने इस पर अधिकार जमाना चाहा है।
विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने संसद में भी साफ किया है कि इस क्षेत्र से भारत की सुरक्षा संबंधी चिंताएं जुड़ी हैं। इसलिए अनदेखी नहीं की जा सकती है। कुल मिलाकर भारत नैतिक पक्ष को मजबूती से रखते हुए डोकलाम में अपने रुख पर कायम है।
चीन का पक्ष
चीन जोर देकर कह रहा है कि डोकलाम से भारत का कोई लेना-देना नहीं है। यह क्षेत्र उसका नहीं है। ऐसे में डोकलाम में भारत की सेना की मौजूदगी अंतरराष्ट्रीय मानदंड का उल्लंघन है। अत: भारत तत्काल अपनी सेना पीछे हटाए और इसके बाद बातचीत होगी। भारत को चीन की पहले सेना हटाने की जिद मान लेने में कोई ऐतराज नहीं है, लेकिन यह तभी संभव है कि जब भारतीय सेना के हटने के बाद चीन अपनी सेना को पीछे ले जाने की गारंटी दे दे।
भारतीय कूटनीतिज्ञों का कहना है कि डोकलाम में भारतीय सेना भूटान के आग्रह और उसे दी गई सुरक्षा गारंटी के आधार पर है। यदि भूटान नहीं चाहेगा तो हमारी सेना वहां कैसे रह सकेगी। ऐसे में भारत और चीन के बीच बढऩे वाला तनाव का माहौल भूटान के लोगों के लिए भी चिंता का विषय है।