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सपा, बसपा ने 2019 का लोकसभा चुनाव साथ लड़ने का दिया संकेत

Sat, 27 May 2017 08:51 AM IST
धीरज कनोजिया/ अमर उजाला, नई दिल्ली।
धीरज कनोजिया/ अमर उजाला, नई दिल्ली। Updated Sat, 27 May 2017 08:51 AM IST
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SP, BSP can fight 2019 Lok Sabha elections together

राष्ट्रपति चुनाव के लिए कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी की ओर से बुलाई गई देशभर के विपक्षी दलों की बैठक में वर्षों बाद सपा और बसपा एक मंच पर साथ दिखे। दोनों दलों ने भविष्य के चुनावों में भी एक साथ आने का संकेत दिया है।

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1993 में यूपी में मिलकर सरकार बनाने के बाद यह पहला मौका माना जा रहा है जब किसी बैठक या मंच पर दोनों पार्टियों के लोग साथ-साथ दिखाई दिए। यही नहीं 2019 के लोकसभा चुनाव में यूपी में साथ-साथ आने के सवाल पर दोनों पार्टियों ने सकारात्मक रुख दिखाया है।
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सपा महासचिव नरेश अग्रवाल ने दोनों पार्टियों के साथ-साथ लोकसभा चुनाव लड़ने के सवाल पर कहा कि राजनीति में कुछ भी असंभव नहीं है। 1977 में जब इंदिरा गांधी ताकतवर हो गईं थीं और देश में आपातकाल लगाया गया था। तब भी भाजपा समेत सभी पार्टियां एकजुट हुई थीं।
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ऐसा 1989 में राजीव गांधी के खिलाफ भी हुआ था। यह पहली बार नहीं हुआ है। सांप्रदायिक शक्तियों को हराने के लिए एकजुटता बहुत जरूरी है। वहीं बसपा के वरिष्ठ नेता सतीश चंद्र मिश्रा ने भी सांप्रदायिक शक्तियों के खिलाफ धर्मनिरपेक्ष दलों की एकजुटता पर जोर दिया।

अंबेडकर जयंती पर बसपा सुप्रीमो मायावती उत्तर प्रदेश में भाजपा को हराने के लिए किसी भी दल के साथ जाने की बात कह चुकी है। सोनिया की बैठक में सपा की ओर से अखिलेश यादव, रामगोपाल यादव और नरेश अग्रवाल मौजूद थे।

वहीं बसपा की ओर से मायावती और सतीश चंद्र मिश्र मौजूद थे। 1995 में लखनऊ गेस्ट हाउस कांड के बाद सपा और बसपा की राह अलग-अलग हुई थी। दरअसल, 1993 में सपा-बसपा ने मिलकर यूपी में गठबंधन सरकार बनाई थी।

लेकिन 1995 में कुछ ऐसा हुआ कि मायावती के लिए मुलायम सिंह राजनीतिक और निजी तौर पर दुश्मन नंबर-1 बन गए। सपा से खींचतान से खफा मायावती उस समय लखनऊ गेस्ट हाउस में सरकार से समर्थन वापसी का एलान करने जा रही थी।


उनके यह एलान करते ही सपा समर्थकों ने गेस्ट हाउस पर हल्ला बोल दिया। मायावती को बंधक बना लिया। उनके साथ काफी अभद्रता की गई। उस घटना के बाद से मायावती ने समाजवादी पार्टी से राह अलग कर ली। 

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