शरद यादव को नीतीश कुमार के नाराज होने की परवाह नहीं
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जेडीयू के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष शरद यादव ने अपनी राह चुन ली है। वह बुधवार को गुजरात से राज्यसभा का चुनाव जीतने पर कांग्रेस के कद्दावर नेता अहमद पटेल को बधाई देने से नहीं चूके। इतना ही नहीं शरद यादव बिहार राज्य में भी लगातार अपने समर्थकों, अनुयाइयों और पार्टी के नेताओं के संपर्क में हैं।
शरद यादव को नीतीश कुमार का महागठबंधन से अलग होना हजम नहीं हो रहा है और उन्होंने साफ कर दिया है कि वह इस रुख को नहीं बदलने वाले। उनके करीबी सूत्रों का कहना है कि शरद यादव को नीतीश कुमार के नाराज होने की परवाह नहीं है।
जेडीयू से निकाले जा सकते हैं शरद यादव! बगावती तेवरों पर कार्रवाई के मूड में पार्टी
शरद यादव आंदोलन से निकले नेता हैं। मूल्यों की राजनीति करते हैं और इस समय संसद में विपक्ष की मजबूत आवाज बने हैं। उन्होंने भीड़ द्वारा लोगों की हत्या से लेकर नोटबंदी और मंगलवार को कांग्रेस नेता कपिल सिब्बल द्वारा 500 के नोट का मुद्दा उठाने का भरपूर समर्थन किया है। इतना ही नहीं गुजरात के जदयू विधायक के अहमद पटेल को वोट देने पर भी उन्होंने बधाई दी है। यह नीतीश कुमार के जले पर नमक छिडक़ने जैसा कदम है, क्योंकि नीतीश कुमार ने अपने विधायक को ऐसा न करने का निर्देश दिया था।
इससे पहले नीतीश कुमार ने मंगलवार आठ जुलाई को अपनी पार्टी के महासचिव और शरद यादव के करीबी अरुण कुमार को उनके पद से हटा भी दिया था। अरुण कुमार को गुजरात में राज्यसभा चुनाव के दौरान पार्टी का एजेंट बनने के लिए चुनाव पीठासीन अधिकारी को पत्र लिखने के कारण नीतिश ने हटाया था। माना जा रहा है कि नीतीश कुमार ने शरद यादव को संदेश देने के लिए यह कदम उठाया था, लेकिन शरद यादव को इसकी कोई परवाह न करते हुए पटेल को बधाई देकर नीतीश के जख्म पर नमक मल दिया है।
नीतिश से बड़े नेता हैं शरद
शरद नीतीश से कद में बड़े नेता हैं। म.प्र. के शरद यादव बिहार से चुनाव लड़ते हैं। बिहार को ही शरद ने राजनीति की कर्मभूमि बना रखी है। राष्ट्रीय राजनीति में भी वह खासा दबदबा रखते हैं। कभी शरद ने नीतीश के साथ मिलकर समता पार्टी का अपनी पार्टी में विलय कराकर जद(यू) बनाए थे।
नीतीश कुमार के राजग का साथ छोडऩे के बाद शरद यादव ने जनता दल और समाजवादी परिवार के एकता पर जोर दिया था। इसी क्रम में वह लालू प्रसाद की पार्टी राष्ट्रीय जनता दल के साथ महागठबंधन की पृष्ठभूमि तैयार करने में सफल हुए थे। शरद यादव यही प्रयोग उ.प्र. विधानसभा चुनाव 2017 में दोहराना चाहते थे। ऐसे में नीतीश कुमार द्वारा ऐन वक्त पर झटका दिए जाने को वह हजम नहीं कर पा रहे हैं।