...जब कोर्ट मार्शल से बाल-बाल बचे थे अर्जन सिंह
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1965 के युद्ध में अहम भूमिका
अर्जन सिंह 1 अगस्त 1964 से 15 जुलाई 1969 तक वायुसेना प्रमुख रहे। 1965 में उन्हें पद्म विभूषण से सम्मानित किया गया। 1965 के युद्ध में बेहद अहम भूमिका निभाने की वजह से वह भारत के पहले ऐसे एयर चीफ मार्शल बने, जिन्हें चीफ ऑफ एयर स्टाफ से सीधे एयर चीफ मार्शल बना दिया गया था।
कई देशों में रहे राजदूत
1970 में 50 वर्ष की उम्र में उन्होंने सेना से रिटायरमेंट ले लिया। रिटायरमेंट के बाद उन्होंने स्विटजरलैंड में भारत का राजदूत बनाया गया। साथ ही साथ वह वेटिकन के लिए भारतीय राजदूत के तौैर पर काम करते रहे। 1974 में उन्हें केन्या का राजदूत नियुक्त किया गया। 1975 से 1981 के बीच वह राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग के सदस्य भी रहे। इसके बाद दिसंबर 1989 से दिसंबर 1990 तक दिल्ली के लेफ्टिनेंट गवर्नर भी रहे। सेना में उनके जबरदस्त योगदान के देखते हुए उन्हें 2002 में एयर फोर्स मार्शल का ओहदा दिया गया।
महज 45 की उम्र में वायुसेना प्रमुख बने और लड़ाई का नेतृत्व किया
जब उन्हें वायुसेना के प्रमुख बनाया गया तो उनकी उम्र महज 45 थी। इतनी क म उम्र में वह युद्ध का नेतृत्व करने वाले पहले वायुसेना प्रमुख थे। वह एक मात्र ऐसे वायुसेना प्रमुख थे जो पांच साल तक पद पर रहे। आम तौर पर वायुसेना के प्रमुख का कार्यकाल ढाई से तीन साल के बीच होता है।
एयर चीफ मार्शल की छवि हमेशा से एक बड़े दिल वाले फील्ड मार्शल की रही है। सैनिकों के कल्याण के प्रति वह हमेशा तत्पर रहे। 1965 के युद्ध का नेतृत्व करने वाले अर्जन सिंह ने दिल्ली में अपना फार्म हाउस बेच कर 2 करोड़ का फंड बनाया इसे सेवानिवृत वायुसेना कर्मियों के कल्याण में लगा दिया। अपनी निजी संपत्ति को सैनिकों के कल्याण में लगाने का यह अद्भुत उदाहरण है।
विभाजन के बाद अर्जन सिंह के परिवार को पंजाब में आदमपुर के नजदीक चिरुवाली गांव में 80 एकड़ जमीन दी गई। अर्जन सिंह ने अपनी जीवनी लिखने वाले लेखक को बताया था कि जब मैंने अपनी जमीन बेची तो इसकी देखभाल करने वाले करतार सिंह को इस पर बना मकान दे दिया। मैंने जमीन इसलिए बेच दी कि नौकरी में रहते हुए मैं इसकी देखभाल नहीं कर सकता था। जब मैंने सरदार स्वर्ण सिंह (तत्कालीन विदेश मंत्री) को यह कहा कि मैंने जमीन बेच दी तो उन्होंने मुझे इसे मार्केट रेट से कम पर बेचने के लिए डांट भी पिलाई। अर्जन सिंह ने इस किताब में कहा है कि अब मैं जाट नहीं रहा क्योंकि मेरे पास अब कोई जमीन नहीं है।