डॉक्टरी पेशे में डर लगता है तो नौकरी छोड़ दें : बांबे हाईकोर्ट
बांबे हाईकोर्ट ने सामूहिक अवकाश पर गए महाराष्ट्र के रेजिडेंट डॉक्टरों को जमकर फटकार लगाई है। हाईकोर्ट ने कहा है कि यदि उन्हें डॉक्टरी पेशे में डर लगता है तो नौकरी छोड़ें। सामूहिक अवकाश के बहाने कंपनी के मजदूरों की तरह हड़ताल पर जाना अराजकता है। जो काम नहीं कर रहे हैं उनकी सेवा समाप्त कर दी जाए।
महाराष्ट्र के डॉक्टर के साथ कथित मारपीट की घटना से नाराज होकर सूबे के 4500 रेजिडेंट डॉक्टर सामूहिक अवकाश पर चले गए हैं। इसको लेकर बांबे हाईकोर्ट में जनहित याचिका दायर की गई थी। मंगलवार को मुख्य न्यायाधीश मंजुला चेल्लूर और न्यायमूर्ति गिरीश कुलकर्णी की पीठ ने सुनवाई की।
सुनवाई के दौरान महाराष्ट्र रेजिडेट डॉक्टर्स एसोसिएशन (मार्ड) के वकील ने दलील दी कि अस्पतालों में डॉक्टरों के साथ मारपीट हो रही है। पिटाई के डर से वह सामूहिक अवकाश पर जाने के लिए मजबूर हुए हैं। इस पर अदालत ने आश्चर्य व्यक्त किया।
जो हड़ताल करते हैं वो डॉक्टर बनने के काबिल नहीं
न्यायमूर्ति ने डॉक्टरों की हड़ताल के दौरान 58 मरीजों की मौत के आंकड़े जानने के बाद कहा कि यदि डॉक्टरी पेशे से इतना ही डर है तो जगह खाली करें। लेकिन, कंपनी के मजदूरों की तरह सामूहिक अवकाश के नाम पर हड़ताल करते हैं तो वह डॉक्टर बनने के काबिल नहीं है।
कोर्ट ने यह भी कहा कि डॉक्टरों को विरोध करने का हक है लेकिन मरीजों के बेसहारा छोड़कर अपनी मांग मनवाने की जिद नहीं कर सकते। कोर्ट ने कहा कि सरकारी अस्पतालों के स्थायी डॉक्टर कैसे काम कर रहे हैं। क्या उन्हें सुरक्षा की चिंता नहीं है। नियमों का उल्लंघन करने पर रेजिडेंट डॉक्टरों के खिलाफ प्रबंधन कार्रवाई करें।
अदालत ने मार्ड के वकील को शपथपत्र पेश करने का निर्देश देकर बुधवार तक के लिए सुनवाई स्थगित कर दी। साथ ही यह भी आदेश दिया कि सभी डॉक्टर काम पर उपस्थित हों। खंडपीठ ने डाक्टरों की हड़ताल को न्यायालय की अवमानना मानते हुए उनके खिलाफ कार्रवाई के संकेत दिए हैं। खंडपीठ ने यह भी कहा कि हर बार डाक्टर की लापरवाही से मरीज की मौत नहीं होती है। कुछ लोगों की मौत दुर्घटना, गंभीर बीमारी, ऐलर्जी व दवा के दुष्प्रभाव के चलते होती है। जिसमें डाक्टर कुछ नहीं कर सकता है। इसलिए हर मौत के लिए डाक्टरों की लापरवाही को जिम्मेदार ठहराना उचित नहीं है।