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बलवान होने का पर्याय थे दारा सिंह

Thu, 13 Jul 2017 06:25 PM IST
बीबीसी
बीबीसी Updated Thu, 13 Jul 2017 06:25 PM IST
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 Dara Singh was synonymous to being strong
दारा सिंह - फोटो : bbc
पंजाब के गांव धर्मुचक में जन्मे दारा सिंह जिन्होंने अपने समय के बड़े-बड़े पहलवानों को अखाड़े की धूल चटाई थी। उनपर 12 जुलाई, 2012 की सुबह मौत ने विजय पा ली। दिल का दौरा पड़ने से उनकी मौत हुई थी। दारा सिंह का पूरा नाम दारा सिंह रंधावा था। मजबूत कद-काठी के दारा सिंह को बचपन से ही कुश्ती का शौक था।
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जिसमें उन्होंने वो मुकाम हासिल किया कि उनका नाम बल और शक्ति का पर्यायवाची सा बन गया। अक्सर किसी को अपने बल का प्रदर्शन करते देख लोग कहते 'देखिए खुद को दारा सिंह समझ रहे हैं' या 'का भई दारा सिंह हो का?' मशहूर अदाकार अनुपम खेर ने उनकी मौत पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा था कि हो सकता है कि इस दौर के युवाओं ने दारा सिंह का नाम न सुना हो लेकिन वो हमारे समय में एक 'आइकन' की तरह थे।
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बीबीसी से एक विशेष साक्षात्कार में दारा सिंह ने खुद कहा था कि कुश्ती ने उन्हें शोहरत दिलाई। ये इंटरव्यू उन्होंने तब दिया था। जब वो 41 साल के थे और एक प्रतियोगिता के सिलसिले में लंदन गए थे। लेकिन दारा सिंह ने कहा कि उन्हें दौलत फिल्मों से मिली दारा सिंह बाद में सामाजिक और राजनीतिक जीवन में भी सक्रिय रहे।
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अखाड़े में उनकी महारथ से उनकी शोहरत धीरे-धीरे हर तरफ फैलने लगी और शुरुआती दौर में कस्बों और शहरों में अपनी कला का प्रदर्शन करने वाले दारा सिंह ने बाद में अंतरराष्ट्रीय स्तर के पहलवानों से मुकाबला किया।

 Dara Singh was synonymous to being strong
दारा सिंह - फोटो : bbc
रुस्तम-ए-पंजाब और रुस्तम-ए-हिंद पुकारे जाने वाले दारा सिंह बाद में राष्ट्रमंडल खेलों में भी कुश्ती चैंपियन रहे। इसमें उन्होंने कनाडा के चैंपियन जॉर्ज गोडियांको को हराया। इससे पहले वो भारतीय कुश्ती चैंपियनशिप पर कब्जा जमा चुके थे। साल 1968 में उन्होंने विश्व कुश्ती चैंपियनशिप भी जीत ली। कुश्ती के क्षेत्र के रुस्तम ने बाद में कलम भी थामी जिसका नतीजा थी।


1989 में प्रकाशित उनकी आत्मकथा, जिसे उन्होंने नाम दिया था 'मेरी आत्मकथा'। कुश्ती के दिनों से ही उन्हें फिल्मों में काम मिलना शुरू हो गया था। कई जगहों पर तो कहा जाता है कि परदे पर कमीज उतारने वाले वो पहले हीरो थे ।सिकंदर-ए-आजम और डाकू मंगल सिंह जैसी फिल्मों से करियर शुरू करने वाले दारा सिंह आखिरी बार इम्तियाज अली की 2007 में रिलीज फिल्म 'जब वी मेट में' अदाकारा करीना कपूर के दादा के रोल में नजर आए थे।

 Dara Singh was synonymous to being strong
दारा सिंह - फोटो : bbc
दारा सिंह हाल में 'जब बी मेट' में नजर आए थे। गुजरे जमाने में अभिनेत्री मुमताज के साथ उनकी जोड़ी बड़ी हिट मानी जाती थी। उन्होंने पंजाबी फिल्मों में भी काम किया था। वो हिंदी फिल्म 'मेरा देश, मेरा धरम' और 'पंजाबी सवा लाख से एक लड़ाऊ' के लेखक और निर्माता-निर्देशक थे।

उन्होंने 10 और पंजाबी फिल्मे भी बनाई थीं। उनकी फिल्म 'जग्गा' के लिए भारत सरकार से उन्हें सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का पुरस्कार भी दिया गया था। बाद में उन्होंने टेलीवीजन सीरियलों में भी काम किया। उन्होंने हिट धारावाहिक रामायण में हनुमान का किरदार निभाया था।

दारा सिंह की आधिकारिक वेबसाइट में उन्हें पहलवान और फिल्मकार के अलावा किसान भी बताया गया है। वो समाज और समुदाय के दूसरे कामों से भी जुड़े रहे और जाट समाज का प्रतिनिधित्व भी किया। साल 2003 में उन्हें भारतीय जनता पार्टी की तरफ से राज्यसभा का सदस्य बनाया गया था।
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