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देश में हर दिन 40 नौनिहालों के साथ होता है बलात्कार, हर 6 मिनट में 1 बच्चे का होता है अपहरण
amarujala.com- Presented By: पूजा मेहरोत्रा
Updated Fri, 10 Nov 2017 04:45 PM IST
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आज बच्चे न घर में सुरक्षित हैं, न स्कूल में और न ही बाहर। बाल यौन शोषण हो या उत्पीड़न भारत में महामारी की तरह फैल चुका है। आंकड़ों पर नजर डालें तो हर 4 में से एक लड़की और 6 में से 1 लड़का 18 वर्ष का होने से पहले यौन हिंसा का शिकार होता है। शोध बताते हैं कि बच्चों के साथ दुर्व्यवहार करने वाले 90 फीसदी लोग परिवार के होते हैं या फिर जानकार होते हैं।
वहीं भारत में हर दिन 40 बच्चों के साथ बलात्कार की घटनाएं होती है जबकि 48 बच्चे दुराचार का शिकार होते हैं। इसी कड़ी में 10 बच्चे ट्रैफिकिंग के शिकार होते हैं, यानी इन बच्चों को
वैश्यावृत्ति और बाल मजदूरी के लिए खरीदा और बेचा जाता है। जबकि हर छह मिनट में देश के किसी कोने से एक बच्चा गायब हो जाता है।
बच्चे न हों हिंसा का शिकार इसके लिए हम कैसे बने भागीदार
बच्चों को हिंसा का शिकार होने से बचाने के लिए बहुत जरूरी है कि उन्हें अनजान के साथ अकेले न छोड़ें और यह भी ध्यान रखें कि क्या किसी पड़ोसी या रिश्तेदार के घर आने पर बच्चा घबराता तो नहीं है। अगर ऐसा है तो अपने बच्चे के सपोर्ट में खड़े रहें। बच्चों के साथ घर, पार्क, स्कूल में सतर्क रहें, ज्यादातर हैवान इन्हीं जगहों पर बच्चों पर नजर रखते हैं और उन्हें अपना शिकार बनाते हैं।
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वहीं भारत में हर दिन 40 बच्चों के साथ बलात्कार की घटनाएं होती है जबकि 48 बच्चे दुराचार का शिकार होते हैं। इसी कड़ी में 10 बच्चे ट्रैफिकिंग के शिकार होते हैं, यानी इन बच्चों को
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वैश्यावृत्ति और बाल मजदूरी के लिए खरीदा और बेचा जाता है। जबकि हर छह मिनट में देश के किसी कोने से एक बच्चा गायब हो जाता है।
बच्चे न हों हिंसा का शिकार इसके लिए हम कैसे बने भागीदार
बच्चों को हिंसा का शिकार होने से बचाने के लिए बहुत जरूरी है कि उन्हें अनजान के साथ अकेले न छोड़ें और यह भी ध्यान रखें कि क्या किसी पड़ोसी या रिश्तेदार के घर आने पर बच्चा घबराता तो नहीं है। अगर ऐसा है तो अपने बच्चे के सपोर्ट में खड़े रहें। बच्चों के साथ घर, पार्क, स्कूल में सतर्क रहें, ज्यादातर हैवान इन्हीं जगहों पर बच्चों पर नजर रखते हैं और उन्हें अपना शिकार बनाते हैं।
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भारत में सेक्स और सेक्सुएलिटी पर चर्चा कम की जाती है
बच्चों की खामोशी और व्यवहार में बदलाव को नजरअंदाज न करें। यौन शोषण करने वाले ज्यादातर लोग करीबी होते हैं, कभी कभी इतने करीबी की आप उनपर विश्वास नहीं कर पाते और खुद के बच्चे को ही डांट देते हैं। बच्चे के साथ ऐसे करीबियों और जानकार लोगों के हाव-भाव और व्यवहार पर नजर रखें।
चाइल्ड एब्यूज के शिकार हुए 7 पीड़ित बच्चों में से 1 बच्चा 5 वर्ष या उससे कम उम्र का होता है। यह भी विडंबना ही है 6 वर्ष से कम उम्र के 40 फीसदी पीड़ित बच्चों में से महज 10 फीसदी ही अपने साथ हुई किसी भी तरह के दुर्व्यवहार को किसी से भी शेयर करने की हिम्मत कर पाते हैं।
यहां तक की अपने परिवार से भी शेयर नहीं कर पाता है, क्योंकि उसे लगता है कि उसके साथ यह हादसा उसकी ही किसी गलती के कारण हुआ होगा (रेप की शिकार हुई अधिकांश महिलाओं के साथ भी ऐसा होता है) अथवा बच्चे यह सोचकर चुप्पी साध लेते हैं कि परिवार उसका पक्ष सुनेगा नहीं या फिर उसकी बातों पर भरोसा नहीं करेगा।
बच्चों के साथ बढ़ रहे हादसों की सबसे बड़ी वजह है कि भारत में सेक्स और सेक्सुएलिटी पर चर्चा कम की जाती है और अगर कोई बच्चा हिम्मत करके अपने साथ हुई किसी ऐसी वारदात को बताना भी चाहता है तो बदनामी के डर और जग हंसाई के कारण परिवार के भीतर ही मामले को शांत करने की कोशिश की जाती है जबकि ऐसे समय में जरूरत होती है कि परिवार एब्यूज्ड बच्चे का साथ दे और दोषी को दंडित करवाने की कोशिश करे।
चाइल्ड एब्यूज के शिकार हुए 7 पीड़ित बच्चों में से 1 बच्चा 5 वर्ष या उससे कम उम्र का होता है। यह भी विडंबना ही है 6 वर्ष से कम उम्र के 40 फीसदी पीड़ित बच्चों में से महज 10 फीसदी ही अपने साथ हुई किसी भी तरह के दुर्व्यवहार को किसी से भी शेयर करने की हिम्मत कर पाते हैं।
यहां तक की अपने परिवार से भी शेयर नहीं कर पाता है, क्योंकि उसे लगता है कि उसके साथ यह हादसा उसकी ही किसी गलती के कारण हुआ होगा (रेप की शिकार हुई अधिकांश महिलाओं के साथ भी ऐसा होता है) अथवा बच्चे यह सोचकर चुप्पी साध लेते हैं कि परिवार उसका पक्ष सुनेगा नहीं या फिर उसकी बातों पर भरोसा नहीं करेगा।
बच्चों के साथ बढ़ रहे हादसों की सबसे बड़ी वजह है कि भारत में सेक्स और सेक्सुएलिटी पर चर्चा कम की जाती है और अगर कोई बच्चा हिम्मत करके अपने साथ हुई किसी ऐसी वारदात को बताना भी चाहता है तो बदनामी के डर और जग हंसाई के कारण परिवार के भीतर ही मामले को शांत करने की कोशिश की जाती है जबकि ऐसे समय में जरूरत होती है कि परिवार एब्यूज्ड बच्चे का साथ दे और दोषी को दंडित करवाने की कोशिश करे।