आपका यह जीवन पूर्वजन्म से इस तरह प्रभावित होता है
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शरीर और आत्मा के बीच मन सेतु का काम करता है। वह कर्मों के संस्कार रचता है। अगर वह बनाना छोड़ दे या पूर्व संस्कारों को मिटाने लगे तो अपना अस्तित्व ही खो देगा।
फिर मानवीय जीवन में भाव संवेदना की कोई भूमिका ही नहीं रह जाएगी क्योंकि भाव संवेदनाए भी मन में ही जन्म लेती है।
कर्मफल के इस नियम को पहले तो शास्त्रीय आधार तक ही सीमित रखा जाता था। अब वैज्ञानिक आधार पर भी इस नियम को परखा जाने लगा है।
अद्वैत आश्रम मुंबई के डा. नरोत्तम पुरी ने इस स्थापना की, शास्त्रीय आधार से हट कर परीक्षा की है। उनके अनुसार कर्मों की यह भूमिका इसी या अगले जन्म में काम करती है।
प्रारब्ध, संचित या क्रियमाण कर्मों के कारण ही कोई व्यक्ति कर्मठ या आलसी स्वभाव का होता है।
त्वचा का होता है पूर्वजन्म से संबंध
डा. पुरी इस विषय पर काम कर रहे हैं कि पिछले जन्म के कर्म इस जन्म के कैसे प्रभावित करते हैं। उन्होंने त्वचा रोगों पर काम किया। उनका कहना है कि मां के गर्भ में भी त्वचा का निर्माण सबसे पहले होता है।
मन भी उसके साथ साथ विकसित होता है। यही कारण है कि मन मे आने वाले विचार या भाव त्वचा को सबसे पहले प्रभावित करते हैं।
रोगंटे खड़े होना, मुरझाना, कम होने लगना या उड़ना जैसी स्थितियां मन में आने वाले विकारों के कारण ही आती हैं। संस्कारों का केंद्र भी मन ही है।
उनका कहना है कि गंभीर रोगों के उपचार से पहले मन की पड़ताल भी करनी चाहिए। बीमारियां कई बार पिछले कर्मों के हिसाब से भी आती है।