गणतंत्र दिवस विशेषः 'यंग इंडिया' के जर्जर होते कानून
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65वां गणतंत्र दिवस मना रहे भारत में आज भी तमाम ऐसे कानून हैं, जो 100 वर्ष से भी ज्यादा पुराने हो चुके हैं। पिछले पैंसठ वर्षों से इनमें से कई कानूनों का उपयोग करने की तो नौबत ही नहीं आई है।
दरअसल देश के कई प्रमुख कानूनों की जड़ें ब्रिटिश काल में ढूंढी जा सकती हैं। साफ है कि ये कानून 100 से 150 साल पुराने हैं।
संसदीय लोकतंत्र में कानून बनाने की जिम्मेदारी संसद के पास होती है। लेकिन जब बात पुराने जर्जर कानूनों को ख्ात्म करने की हो तो संसद भी समय की कमी का बहाना बनाकर अपनी जिम्मेदारियों से पल्ला झाड़ती दिख्ाती है।
भारतीय विधि आयोग समय-समय पर अपनी रिपोर्टों के जरिये सरकार को ऐसे कानूनों को खत्म करने की सलाह देता आया है। लेकिन हर बार सरकारी उदासीनता आड़े आ जाती है। आइए, इनमें से कुछ प्रमुख कानूनों पर नजर डालें।
आईपीसीः भारतीय न्यायिक तंत्र की रीढ़
1860 में जब इंडियन पीनल कोड बनाया गया, तो तत्कालीन वायसराय लॉर्ड कैनिंग ने शायद ही यह सोचा होगा कि 154 साल बाद भी यह भारतीय न्यायिक तंत्र की रीढ़ बना रहेगा।
आईपीसी भारत के भीतर (जम्मू और कश्मीर को छोड़कर) भारत के किसी भी नागरिक द्वारा किए गए अपराधों की परिभाषा और दंड का प्रावधान करती है। जम्मू और कश्मीर में इसे रणबीर दंड संहिता (आरपीसी) के नाम से जाना जाता है।
1862 में इसके लागू होने के बाद से समय-समय पर इसमें संशोधन किए गए हैं, लेकिन यह भी सच है कि वर्तमान परिस्थितियों से निपटने में ये काफी नहीं रहे हैं।
पुलिस एक्ट, 1861
तमाम बहसों के बावजूद भारत में पुलिस सुधार के नाम पर कोई खास पहल नहीं की जा सकी है। आज भी भारतीय पुलिस की जीवन रेखा 1861 के पुलिस अधिनियम के प्रावधानों के मुताबिक ही चलती है।
गौरतलब है कि यह पुलिस अधिनियम 1857 के पहले स्वतंत्रता संग्राम के बाद लाया गया था। दरअसल ब्रिटिश सरकार को भारतीयों से ऐसे ऐतिहासिक विद्रोह की कतई उम्मीद नहीं थी।
ऐसे समय में अंग्रेजों ने 1861 का पुलिस एक्ट पारित किया। भविष्य में किसी भी तरह के विद्रोह को रोकना ही इस एक्ट का एकमात्र उद्देश्य था।
जाहिर है, इसमें तमाम ऐसे प्रावधान जोड़े गए जो पुलिस को दमन की अतिरिक्त ताकत देते हों। लेकिन आज 'पुलिस राज्य' की जगह 'कल्याणकारी राज्य' ने ले ली है। समय के साथ-साथ अपराधों की परिधि में विस्तार हुआ है।
संगठित अपराध पुलिस के सामने कई चुनौतियां पेश कर रहे हैं। पुलिस को मानवीय चेहरा देने की वकालत करने वाले तो तमाम हैं, लेकिन इसके लिए जरूरी राजनीति इच्छाशक्ति अब तक नहीं दिखी है।
इंडियन टेलीग्राफ एक्ट, 1885
1885 को केवल भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना के लिए याद नहीं किया जाता।
दरअसल इसी साल इंडियन टेलीग्राफ एक्ट भी अस्तित्व में आया था। यह इलेक्ट्रॉनिक क्रांति से पहले की घटना है। उस समय टेलीविजन जैसी किसी चीज का नाम तक लोगों ने नहीं सुना था।
इस एक्ट का उद्देश्य भारत में टेलीग्राफी, फोन, संचार, रेडियो, टेलेक्स और फैक्स के संचालन को सुगम बनाना था।
इसके अलावा इस एक्ट में तमाम ऐसे प्रावधान भी किए गए जो भारत में टेलीग्राफी और इससे जुड़ी बुनियादी संरचना पर ब्रिटिश नियंत्रण को मजबूत बनाते थे।
तब से लेकर आज तक इस एक्ट में तमाम संशोधन बेशक हुए हों, लेकिन आज इसके कई प्रावधान समयानुकूल नहीं रह गए हैं।
खासकर भारतीय दूरसंचार विनियामक प्राधिकरण (ट्राई) और नई टेलीकॉम नीति की स्थापना ने इस एक्ट में गंभीर संशोधन की जरूरत जोर दिया है।
धारा 377
इंडियन पीनल कोड की धारा 377 पिछले काफी समय से चर्चा में है।
दरअसल 1860 में बना यह कानून समलैंगिकता को अपराध घोषित करता है। तब से डेढ़ सौ साल से भी ज्यादा वक्त बीत जाने के बावजूद इस कानून में कोई बदलाव नहीं हो सका है।
हालांकि पिछले कुछ सालों के घटनाक्रमों से लगने लगा था कि धारा-377 को बदला जाएगा। लेकिन हाल ही में सर्वोच्च अदालत ने दिल्ली उच्च न्यायालय के फैसले को पलटते हुए समलैंगिकता को एक बार फिर से अपराध की श्रेणी में ला दिया।
दरअसल, शीर्ष अदालत के मुताबिक धारा-377 में कुछ भी असंवैधानिक नहीं है और महज इस आधार पर कि समाज बदल गया है, समलैंगिकता को कानूनी वैधता नहीं दी जा सकती।
केंद्र सरकार ने भले ही इस मामले पर पुनः विचार के लिए अदालत से आग्रह किया हो, लेकिन फिलहाल वर्षों पुराने इस कानून में किसी बदलाव के संकेत मिलते नहीं दिख रहे हैं।
लेपर्स एक्ट, 1898
ब्रिटिश सरकार ने 1898 में लेपर्स एक्ट को पारित किया था।
उद्देश्य था, कुष्ठ रोगियों से समाज के दूसरे लोगों की सुरक्षा करना। दरअसल, उस समय कुष्ठ रोग एक लाइलाज बीमारी थी। लोगों में इसको लेकर डर का माहौल था।
गौरतलब है कि महात्मा गांधी ने इन्हीं कुष्ठ रोगियों की सेवा को अपना धर्म माना था। आजादी के बाद 1955 में भारत सरकार ने राष्ट्रीय कुष्ठ नियंत्रण कार्यक्रम की शुरुआत की।
इसके अलावा 1982 से मल्डी ड्रग थेरेपी (एमडीटी) का इस्तेमाल शुरू हुआ। 1983 से जब सरकार ने इस बीमारी से निपटने के लिए पूरी तरह कमर कसी, इस रोग को लेकर लोगों का डर भी दूर होता गया।
हालांकि इस एक्ट को अब खत्म कर दिया गया है, लेकिन इसके आधार पर बने दर्जन भर से ज्यादा कानून अभी भी अस्तित्व में हैं।
अब जबकि कुष्ठ रोग का इलाज पूरी तरह संभव है, ऐसे कानूनों का कोई औचित्य नहीं होना चाहिए।