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नरेंद्र मोदी की राजनीति: कांग्रेस के प्रतीक हड़पो और राज करो

Tue, 26 May 2015 11:30 AM IST
विनोद वर्मा/ संपादक, अमर उजाला डॉट कॉम
विनोद वर्मा/ संपादक, अमर उजाला डॉट कॉम Updated Tue, 26 May 2015 11:30 AM IST
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Narendra Modi's politics is shark congress symbol and rule

अब यह सिर्फ अवधारणा नहीं है। एक सच की तरह स्थापित हो चुका है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जवाहर लाल नेहरू को घृणा करने की हद तक नापंसद करते हैं। नेहरू के बरक्स उनकी पसंद सरदार वल्लभ भाई पटेल हैं। उनकी पार्टी भाजपा और उनके मातृ संगठन आरएसएस के लिए महात्मा गांधी हीरो कभी नहीं रहे लेकिन वे जरूरतों के मुताबिक महात्मा गांधी का नाम भुनाने में हर्ज नहीं समझते। लेकिन जब उनकी पार्टी के सदस्य महात्मा गांधी की हत्या करने वाले नाथूराम गोडसे का महिमामंडन करते हैं तो वे एक रहस्यमयी चुप्पी साध लेते हैं।

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वे भाजपा के राजनीतिक लाभ के लिए नए प्रतीकों की तलाश में हैं। इसके लिए कभी वे भीमराव अंबेडकर को दूसरी पार्टियों से छीन लेना चाहते हैं तो कभी जयप्रकाश नारायण को। कई राजनीतिक टीकाकारों का आंकलन है कि नरेंद्र मोदी की इस पसंद नापसंद का नाता सिद्धांत और विचारधारा से कतई नहीं है।
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दरअसल नरेंद्र मोदी का इतिहास बोध इतना कमजोर है कि वे चाहें भी तो विचारधारा के स्तर पर किसी को खारिज नहीं कर सकते। दूसरे उनके पास विकल्प का अभाव भी है। वे जिस राजनीतिक दर्शन से आते हैं, उसमें उनके पास गिनाने को ऐसे उदाहरण ही नहीं हैं जिनकी राजनीतिक स्वीकार्यता हो। इसलिए वे हर प्रतीक को या तो हड़प लेना चाहते हैं या फिर उनकी छवि को मिटा देना चाहते हैं।

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नेहरू की छवि मिटाने की कोशिश

Narendra Modi's politics is shark congress symbol and rule

देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू को राष्ट्र निर्माता भी कहा जाता रहा है। जो नेहरूवादी हैं वे मानते हैं कि परिस्थिति और देशकाल के अनुरूप नेहरू ने देश को एक ऐसी दिशा दी जिसके बारे में उनका कोई और समकालीन सोच भी नहीं सकता था। हालांकि नरेंद्र मोदी की भारतीय जनता पार्टी ऐसा नहीं मानती। वह मानती है कि 1962 में चीन से हार, कश्मीर के मुद्दे को विवादित बनाने और मुसलमानों की तुष्टिकरण की नीति के लिए जवाहर लाल नेहरू ही जिम्मेदार थे। ऐसा नहीं है कि वामपंथी दल नेहरू को किसी आदर्श की तरह देखते हैं। वे भी नेहरू पर स्वास्थ्य, प्राथमिक शिक्षा, भूमि-सुधार और गरीबी निवारण की दिशा में पर्याप्त ध्यान न देने का दोषी मानते हैं।

लेकिन नरेंद्र मोदी अपनी पार्टी से एक कदम आगे हैं। वे नेहरू को प्रधानमंत्री बनाए जाने को ही चुनौती देते हैं। अक्तूबर, 2013 को मंच पर तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की उपस्थिति में उन्होंने कहा था (http://goo.gl/KZ7BMG), "हर देशवासी चाहता था कि सरदार वल्लभ भाई पटेल देश के पहले प्रधानमंत्री बनें। अगर ऐसा होता तो देश का भाग्य और चेहरा ही कुछ और होता। वे दूरद्रष्टा थे।" नरेंद्र मोदी के इस विचार पर बहुत कुछ कहा जा चुका। नेहरू और पटेल के संबंधों पर बहुत कुछ लिखा जा चुका लेकिन मोदी जी अडिग हैं। वे पटेल को वहां स्थापित कर देना चाहते हैं जहां से नेहरू का कद छोटा दिखाई पड़े।

इसकी कई वजहें गिनाई जाती हैं। लेकिन सबसे बड़ी वजह यह दिखती है कि वे जानते हैं कि नेहरू की छवि को धूमिल किए बिना नेहरू-गांधी परिवार के राजनीतिक वर्चस्व को खत्म नहीं किया जा सकता। आसान शब्दों में कहें तो कांग्रेस को कमजोर करने के लिए उन्हें नेहरू की प्रतिमा को तोड़ना आसान विकल्प दिखता है। वे इस बहाने सोनिया गांधी और राहुल गांधी की चुनौती को खत्म कर देना चाहते हैं। ऐसा लगता है कि वे मानते हैं कि एक बार नेहरू-गांधी परिवार हटा तो कांग्रेस को अपना अस्तित्व तलाशने में कई दशक लग जाएंगे। और वे निर्विवाद रूप से देश के नेता बने रहेंगे। लेकिन राजनीतिक विश्लेषक नेहरू और पटेल की तुलना को हास्यास्पद भी मानते हैं। अंबरिश के दीवानजी ने अपने एक लेख (http://goo.gl/hY9CvQ)
में लिखा है, "नेहरू से पटेल की तुलना वैसी है जैसे कोई मोदी की तुलना गडकरी से करे."

मोदी की मजबूरी का भी नाम महात्मा गांधी

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जो इतिहास को जानते हैं और खासकर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के इतिहास को, वे अच्छी तरह जानते हैं कि भाजपा-आरएसएस के लिए महात्मा गांधी कौन हैं। संक्षेप में बताया जाए तो उनकी नजर में तो देश के विभाजन के लिए जिम्मेदार, हिंदुओं की तुलना मे्ं मुसलमानों को बढ़ावा देने वाले और नेहरू को देश का पहला प्रधानमंत्री बनाने के दोषी महात्मा गांधी ही थे। सिद्धांत रूप से संघ के लोग मानते हैं कि नाथूराम गोडसे का महात्मा गांधी को गोली मारना गलत नहीं था। कुछ तो गोडसे को सम्मान का हकदार भी मानते हैं। संघ के प्रचारक रहे नरेंद्र मोदी इस बारे में क्या सोचते हैं यह शायद किसी को नहीं पता लेकिन उनकी उनकी मजबूरी है कि भारत से लेकर दुनिया के हर देश में उन्हें बार बार महात्मा गांधी की शरण में जाना पड़ता है। यह तो किसी राजनेता के लिए संभव नहीं कि किसी विदेशी धरती पर वह महात्मा गांधी का नाम लिए बिना वह भारत को परिभाषित कर सके। इसलिए मोदी भी वही कर रहे हैं।

हालांकि कुछ विश्लेषक कहते हैं कि यह भी कांग्रेस को निहत्था करने की रणनीति का हिस्सा है। वे मानते हैं कि चूंकि महात्मा गांधी पर कांग्रेस की अपना स्वाभाविक हक मानती थी। इसलिए यह देखना कांग्रेस के लिए सहज नहीं होगा कि भाजपा का प्रधानमंत्री गांधी को इस तरह से हड़प ले जा रहा है। 'स्वच्छ भारत' अभियान को गांधी को हड़प लेने की रणनीति की तरह ही देखा जाता है। वैसे कुछ बुद्धिजीवी मानते हैं कि यह सर्वथा गांधी को स्वच्छता भर से जोड़ देना गांधी के कद को भी छोटा कर देने जैसा है। अगर ऐसा है भी तो यह संघ और भाजपा की विचारधारा के अनुरूप ही है।

अंबेडकर को भी मोदी के पाले में लाने की कोशिश

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भाजपा और संविधान निर्माता भीमराव अंबेडकर की बात करें तो सबसे पहले एनडीए के पूर्व मंत्री और भाजपा सांसद अरूण शौरी की किताब 'वर्शिपिंग फॉल्स गॉड्स' याद आती है। इस किताब में शौरी ने बताने की कोशिश की है कि अंबेडकर दरअसल अंग्रेजों से मिले एक षडयंत्रकारी थे जिन्होंने आजादी की लड़ाई को कमजोर करने की कोशिश की। वह एक विचार था, चाहे जितना एकतरफा हो।

लेकिन सच यह है कि अंबेडकर इस देश में दलितों के लिए एक मसीहा थे और रहेंगे। एक ऐसा दलित नेता जो संविधान का निर्माता था। अंबेडकर पर जितना हक मायावती की बहुजन समाज पार्टी जताती है उतना ही महाराष्ट्र में आरपीआई भी जताती है। कांग्रेस भी उन्हें सुविधाजनक ढंग से अपना मानती है। ऐसे में यह नरेंद्र मोदी एंड कंपनी की सुनियोजित रणनीति लगती है कि अंबेडकर को अपना लिया जाए। इस बार यानी पिछले 14 अप्रैल को अंबेडकर के जन्मदिन पर सरकार जितनी सक्रियता से अंबेडकर को अपनाने की कोशिश करती हुई दिखी उत्तर प्रदेश में नीले झंडे को रोककर भगवा लहराना है तो यह समझौता भी सही।

अभी तो यह शुरुआत है

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जो इस राजनीति को देख रहे हैं वो मानते हैं कि गांधी से लेकर अंबेडकर तक को हड़पने की कोशिश और नेहरू की छवि ध्वस्त करने के लिए पटेल को उभारना एक शुरुआत भर है। अभी इस क्रम में भगत सिंह, जयप्रकाश नारायण से लेकर लाल बहादुर शास्त्री तक कई नाम हैं। जैसी जैसी राजनीतिक जरूरतें होंगी वैसे वैसे संघ और भाजपा की रणनीति बदलेगी।

कई टीकाकार कहते हैं कि नरेंद्र मोदी की कार्यशैली इंदिरा गांधी से बहुत मिलती जुलती है। लेकिन इतना तय है कि मोदी के मुंह से किसी भी दिन, गलती से भी, इंदिरा गांधी का नाम नहीं निकलेगा।

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