नेता जी यहां देखिए 'भूख का समाजवाद'
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हाड़ कंपकंपाती ठंड के बीच राहत शिविरों में ठहरे शरणार्थियों के आंखों की नींद गायब है। सुबह पांच बजे से ही शरणार्थी परिवारों के लोग दो वक्त की रोटी की जुगाड़ में जुट जाते हैं।
शिविर में अधिकांश परिवारों का चूल्हा मददगारों के भरोसे ही जलता है। अमर उजाला टीम ने मलकपुर राहत शिविर में पहुंचकर दंगा पीड़ितों के दुख-दर्द को साझा कर उनकी हकीकत जानी।
तस्वीरें: नेताजी देखिए, क्या यही हैं कांग्रेस-बीजेपी के लोग?
भूखे पेट रहने को मजबूर
मलकपुर राहत शिविर में सुबह पांच बजे अधिकतर शरणार्थी परिवार जाग जाते हैं। सुबह चाय की व्यवस्था बच्चों के लिए प्रशासन द्वारा उपलब्ध कराए जा रहे दूध से हो जाता है। इसके बाद शुरू हो जाती है दिन और रात की रोटी की जुगाड़।
कुछ परिवार के लोग जमा पूंजी से दाल और रोटी की व्यवस्था कर लेता है। बाकी परिवार के पुरुष पेट की आग बुझाने के लिए काम-धंधे की तलाश में निकल जाते हैं। घर की महिलाएं टकटकी लगाए राशन का सामान लाने वाले किसी मददगार का इंतजार करने लगती हैं।
शिविर में सामान से लदे ट्रकों के पहुंचते ही शरणार्थियों की लाइन लग जाती है। कई परिवारों को राशन नहीं मिलने के कारण भूखे पेट रहने को मजबूर होना पड़ता है।
कोई काम देने को राजी नहीं
शिविर में ठहरी शेरपुर जुहारा की जरीना ने बताया कि जमा पूंजी खत्म हो गई है। दो वक्त की रोटी का इंतजाम करने को बेटा आस मोहम्मद काम की तलाश में कैराना भी गया। हालांकि अंजान होने के कारण कोई काम देने को उसे राजी नहीं।
आसपास के खेत में किसी के यहां मेहनत-मजदूरी कर रोटी का जुगाड़ होता है। लांक के इस्लाम, सिरसली के अब्दुल कयूम ने बताया कि रोटी के इंतजाम के लिए परिवार के लड़के काम की तलाश में गए।
लोग काम देने की एवज में जमानती मांग रहे हैं, लेकिन उन्हें यहां कोई जानता ही नहीं। आसपास के किसानों के खेत में जाकर मजदूरी या कहीं जाकर पल्लेदारी करके परिवार के लोग रोटी का जुगाड़ कर रहे हैं।
मौसम ने बढ़ाई मुश्किलें
पिछले कई दिनों से मौसम खराब होने के कारण सोलर लाइट की बैटरी भी चार्ज नहीं हो रही। ठंड और कोहरा शरणार्थियों के लिए मुसीबत बन गया है।
घर वापसी से ही समाधान संभव
शामली के एडीएम प्रताप सिंह भदौरिया ने कहा कि प्रशासन ने राहत शिविरों को पर्याप्त मदद दी। एक करोड़ से अधिक इन शिविरों पर खर्च हो चुकी है। दूध की आपूर्ति इन्हें की जा रही है। इनमें रहने वाले अधिकांश बाहरी जनपदों के लोग हैं, जहां हिंसा नहीं हुई। घर लौटने पर लोगों को प्रशासन पूरी सुरक्षा देगा। फिर भी लोग घर लौटने को तैयार नहीं हैं।