दिल्ली के 'नायक' पर चढ़ा नेताजी का रंग
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अरविंद केजरीवाल की अगुवाई में जब दिल्ली में आम आदमी पार्टी की सरकार बनी, तो लगा जैसे राजनीति में बदलाव आ रहा है। बहुत दिनों बाद कोई ऐसा नेता दिखा, जो आम लोगों की दिक्कतों की बात करता था।
दिल्ली की सरकार ने शुरुआत भी धमाकेदार तरीके से की। पानी और बिजली के मोर्चे पर बड़े फैसले लेकर जनता को राहत दी गई। लेकिन बीते एक महीने में वह कई बार विवादों में फंसी। लेकिन अब ऐसा लगता है कि केजरीवाल पर भी नेताओं वाला रंग चढ़ने लगा है। उनके कुछ फैसले इसी ओर इशारा करते हैं।
84 के दंगों का जिक्र हुआ, तो केजरीवाल को याद आया कि घोषणापत्र में एसआईटी के गठन का वादा उन्होंने भी किया था। सोमनाथ के खिलाफ सख्त रही दिल्ली महिला आयोग की अध्यक्ष बरखा सिंह को हटाने की तैयारी हो रही है। इसके अलावा पहले हड़ताली कर्मचारियों को समझाने की कोशिश थी, लेकिन अब उन्हें धमकाया जा रहा है।
हड़ताली कर्मचारियों को पहले मनाया
दिल्ली परिवहन निगम (डीटीसी) के अस्थाई कर्मचारी नौकरी पक्की करने के लिए हड़ताल कर रहे हैं और आम आदमी पार्टी उन्हें आश्वासन दे रही है कि वह उनके लिए कदम उठाने को तैयार है, लेकिन इसमें कुछ वक्त लगता है।
दो दिन पहले अरविंद केजरीवाल धरने की जगह पर पहुंचें और प्रदर्शनकारियों से कहा, "दोस्तों, हम सभी को पक्का करेंगे, लेकिन इसके लिए प्रक्रिया अपनानी होगी, जिसके बिना यह मुमकिन नहीं है।"
उन्होंने कहा, "अगर हम चले गए, तो भाजपा-कांग्रेस आपको जिंदगी भर पक्का नहीं करेगी। इसलिए मेरा साथ दो। मुझे मुख्यमंत्री नहीं बनना था। यह जनता की सरकार है, इसलिए फिक्र नहीं है कि कब गिरेगी।" केजरीवाल की बात का कुछ असर होता, लेकिन बुधवार को हड़ताल कर रहे अस्थाई शिक्षकों को उनके सहयोगी और शिक्षा मंत्री मनीष सिसोदिया ने धमकी भरे अंदाज में समझाया।
अगले दिन हड़ताली शिक्षकों को धमकाया
धरना और अनशन करके अपनी मांगे मनवाने वाली आम आदमी पार्टी की सरकार ने आंदोलन करने वालों को चेतावनी दी है। दिल्ली सरकार के शिक्षा मंत्री मनीष सिसोदिया ने कहा है कि अगर हड़ताल या धरना देने वाले कर्मचारी काम पर नहीं लौटे तो उनकी जगह नई भर्ती होगी। उन्होंने कहा कि इस बाबत दिल्ली सरकार जल्द ही आदेश जारी कर समय निर्धारित करेगी।
हालांकि, डीटीसी कर्मचारी और शिक्षकों ने हड़ताल व धरना खत्म करने से इनकार कर दिया है। सिसोदिया ने कहा कि अस्थाई कर्मचारियों को नियमित करने के लिए समिति बनाई गई है। शिक्षकों और अलग-अलग विभागों में तैनात कर्मचारियों को रिपोर्ट आने और नई भर्ती प्रक्रिया पूरी होने तक हटाया नहीं जाएगा।
इतना ही नहीं जो अस्थाई कर्मचारी काम कर रहे हैं उन्हें आयु में छूट व उनके अनुभव को वेटेज देने जैसी बातें भर्ती शर्तों में शामिल की जाएंगी। उन्होंने कहा कि अगर शिक्षक या अन्य कर्मचारी हड़ताल पर चले जाएंगे तो आम लोगों को दिक्कत आएगी।
बरखा सिंह को हटाने पर बवाल
हड़ताली कर्मचारियों से निपटने के अलावा दिल्ली महिला आयोग का अध्यक्ष पद भी इस बात का संकेत दे रहा है कि केजरीवाल और आम आदमी पार्टी की राजनीति में कुछ बदलाव आया है। 'राजनीति बदलने' का दावा करने वाली पार्टी ने दावा किया था कि किसी के भी खिलाफ राजनीतिक बदले की भावना से काम नहीं किया जाएगा।
लेकिन जब दिल्ली महिला आयोग की अध्यक्ष और कांग्रेसी नेता बरखा सिंह ने कानून मंत्री सोमनाथ भारती के तय वक्त पर पेश न होने को लेकर सख्त रुख दिखाया, तो दिल्ली सरकार ने उन्हें हटाने का फैसला किया। उनकी जगह हिंदी की मशहूर लेखिका मैत्रेयी पुष्पा को अगला अध्यक्ष बनाने की बात चल रही है।
केजरीवाल ने सफाई दी, "इस पद को राजनीति का अखाड़ा बना दिया गया था। जिसकी सरकार होती, उसकी अध्यक्ष बन जाती। हमने मैत्रेयी पुष्पा के जरिए इस परपंरा को तोड़ने की कोशिश की।" लेकिन सवाल लाजिमी है कि ऐसा सोमनाथ भारती वाला एपिसोड सामने आने के बाद ही क्यों हुआ, जबकि दिल्ली की कमान संभालते ही यह केजरीवाल यह फैसला कर सकते थे।
क्या बदले की भावना से हुई कार्रवाई?
इस मुद्दे को लेकर दिल्ली महिला आयोग की अध्यक्ष बरखा सिंह और दिल्ली सरकार आमने-सामने आ गई है। बरखा सिंह ने कहा कि कानून मंत्री सोमनाथ भारती को समन दिए जाने के कारण उन्हें पद से हटाने की धमकी दी जा रही है।
एक ओर जहां दिल्ली सरकार ने उन्हें दिल्ली महिला आयोग के अध्यक्ष पद से हटाने का मन बना लिया है वहीं बरखा सिंह ने साफ कर दिया है कि वह इस्तीफा नहीं देंगी। वह बृहस्पतिवार को उपराज्यपाल से मुलाकात कर इस मामले को उठाएंगी।
बुधवार को दिल्ली महिला आयोग की अध्यक्ष ने कहा कि सरकार की ओर से महिला सुरक्षा के दावे किए जाते रहे हैं लेकिन महिला होने के बावजूद उन्हें प्रताड़ित किया जा रहा है। उन्होंने आरोप लगाया कि उनके घर के बाहर लोग टोपी लगाकर आ जाते हैं और इस्तीफा दो के नारे लगाते हैं।
केजरीवाल को याद आए सिख विरोधी दंगे
इन दिनों सिख विरोधी दंगों का मामला भी गर्म हो उठा है। राहुल गांधी ने एक टीवी चैनल को दिए इंटरव्यू में कहा कि गुजरात दंगों के लिए नरेंद्र मोदी जिम्मेदार हैं, जबकि दिल्ली में दंगों को लेकर उन्होंने तत्कालीन कांग्रेस सरकार को क्लीन चिट दे दी।
जाहिर है, भाजपा ने यह मुकदमा लपक लिया और कांग्रेस बैकफुट पर आती दिखी। इस बीच राजनीति की बहती गंगा में केजरीवाल ने भी हाथ धोने की शुरुआत कर दी। उन्होंने उप-राज्यपाल से आग्रह किया कि इन दंगों की जांच एसआईटी से कराई जाए।
उनका कहना था कि यह बात घोषणापत्र में भी थी। लेकिन यह समझ से परे है कि बीते एक महीने में यह बात केजरीवाल को याद क्यों नहीं आई और राहुल के इंटरव्यू के बाद ही यह मामला उठाया गया। इसके अलावा केजरीवाल देविंदर पाल सिंह भुल्लर की रिहाई की मांग भी उठा रहे हैं। एक तबके का मानना है कि यह दोनों कदम दिल्ली में सिख वोटों तक पहुंचने की कोशिश है।
खेला एसआईटी का दांव
अरविंद केजरीवाल के इस कदम का दंगा पीड़ितों के साथ ही शिरोमणि अकाली दल और भाजपा ने समर्थन किया है। वहीं, फैसले से असहज दिख रही कांग्रेस ने कहा है कि वह दंगों की किसी भी जांच का विरोध नहीं करती है।
केजरीवाल सरकार ने यह फैसला कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने उस बयान के दो दिन बाद किया है, जिसमें उन्होंने दंगों में कुछ कांग्रेसियों के शामिल होने की बात तो मानी थी, लेकिन दंगा पीड़ितों से माफी मांगने से इनकार कर दिया था। दिल्ली सरकार के इस फैसले से कांग्रेस और आप के बीच खटास बढ़ने की भी संभावना है।
केजरीवाल ने बाद में बताया कि मैंने 1984 दंगे की जांच एसआईटी से कराने के लिए उपराज्यपाल से मुलाकात की है। इस मुद्दे पर उपराज्यपाल का रुख सकारात्मक रहा। एसआईटी से जांच का मुद्दा हमारे घोषणापत्र का हिस्सा भी था। एसआईटी के संगठनात्मक ढांचे और कार्यक्षेत्र का फैसला जल्द ही कैबिनेट में तय किया जाएगा।